अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 15

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदग्ँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥

yadicchanto brahmacaryaṃ caranti tatte padag̐ saṃgraheṇa bravīmyomityetat .. 15 ..


सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहते हैं, जिसकी इच्छा से [मुमुक्षुजन] ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ । ‘ॐ’ यही वह पद है ॥ १५ ॥

समस्त वेद जिस पद अर्थात् गमनीय स्थान का अविभाग यानी एक रूप से आमनन—प्रतिपादन करते हैं, समस्त तपों को भी जिसके लिये कहते हैं अर्थात् वे जिस स्थान की प्राप्ति के लिये हैं, जिसकी इच्छा से गुरुकुलवासरूप ब्रह्मचर्य अथवा ब्रह्मप्राप्ति में उपयोगी कोई और साधन करते हैं उस पद को, जिसे कि तू जानना चाहता है, मैं संक्षेप में कहता हूँ ।

‘ॐ’ यही वह पद है । यह जो ‘ॐ’ है यानी जो ॐ शब्द का वाच्य और ॐ ही जिसका प्रतीक है वही वह पद है जिसे तू जानना चाहता है ॥ १५ ॥

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सर्वे वेदा यत्पदं पदनीयं गमनीयमविभागेनामनन्ति प्रतिपादयन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति यत्प्राप्त्यर्थानीत्यर्थः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं गुरुकुलवासलक्षणमन्यद्वा ब्रह्मप्राप्त्यर्थं चरन्ति तत्ते तुभ्यं पदं यज्ज्ञातुम् इच्छसि संग्रहेण संक्षेपतो ब्रवीमि ।

ओमित्येतत् । तदेतत्पदं यद्बुभुत्सितं त्वया । यदेतद् ओमित्योंशब्दवाच्यमोंशब्दप्रतीकं च ॥ १५ ॥


इसलिये—
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अतः—