अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 16

एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥

etaddhyevākṣaraṃ brahma etaddhyevākṣaraṃ param .
etaddhyevākṣaraṃ jñātvā yo yadicchati tasya tat .. 16 ..


यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही पर है, इस अक्षर को ही जानकर जो जिसकी इच्छा करता है, वही उसका हो जाता है ॥ १६ ॥
यह अक्षर ही अपर ब्रह्म है और यह अक्षर ही पर ब्रह्म है । यह अक्षर उन दोनोंही का प्रतीक है । इस अक्षर को ही ‘यही उपास्य ब्रह्म है’ ऐसा जानकर जो पर अथवा अपर जिस ब्रह्म की इच्छा करता है उसे वही प्राप्त हो जाता है । यदि उसका उपास्य पर ब्रह्म हो तो वह केवल जाना जा सकता है और यदि अपर ब्रह्म हो तो प्राप्त किया जा सकता है ॥ १६ ॥
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एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्मापरमेतद्ध्येवाक्षरं परं च । तयोर्हि प्रतीकमेतदक्षरम्, एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वोपास्यब्रह्मेति यो यदिच्छति परमपरं वा तस्य तद्भवति । परं चेज्ज्ञातव्यमपरं चेत्प्राप्तव्यम् ॥ १६ ॥

क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये—
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यत एवमतः—