एतदालम्बनग्ँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥
etadālambanag̐ śreṣṭhametadālambanaṃ param .
etadālambanaṃ jñātvā brahmaloke mahīyate .. 17 ..
यही श्रेष्ठ आलम्बन है, यही पर आलम्बन है । इस आलम्बन को जानकर पुरुष ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥
यह [ओंकाररूप] आलम्बन ब्रह्मप्राप्ति के [गायत्री आदि] सभी आलम्बनों में श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है । पर और अपर ब्रह्मविषयक होने से यह आलम्बन पर और अपररूप है । तात्पर्य यह है कि इस आलम्बन को जानकर साधक ब्रह्मलोक अर्थात् परब्रह्म में स्थित होकर महिमान्वित होता है तथा अपर ब्रह्म में ब्रह्मत्व को प्राप्त होकर ब्रह्म के समान उपासनीय होता है ॥ १७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
एतदालम्बनमेतद्ब्रह्मप्राप्त्यालम्बनानां श्रेष्ठं प्रशस्यतमम् । एतदालम्बनं परमपरं च परापरब्रह्मविषयत्वात् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते परस्मिन् ब्रह्मणि । अपरस्मिंश्च ब्रह्मभूतो ब्रह्मवदुपास्यो भवतीत्यर्थः ॥ १७ ॥
उपर्युक्त ‘अन्यत्र धर्मात्’ इत्यादि श्लोक से नचिकेताद्वारा पूछे गये सर्वविशेषरहित आत्मा के तथा मन्द और मध्यम उपासकों के लिये अपर ब्रह्म के प्रतीक और आलम्बनरूप से ओंकार का निर्देश किया गया । अब, जिसका आलम्बन ओंकार है उस आत्मा के स्वरूप का साक्षात् निर्धारण करने की इच्छा से यह कहा जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अन्यत्र धर्मादित्यादिना पृष्टस्यात्मनोऽशेषविशेषरहितस्य आलम्बनत्वेन प्रतीकत्वेन चोङ्कारो निर्दिष्टः; अपरस्य च ब्रह्मणो मन्दमध्यमप्रतिपत्तॄन्प्रति । अथेदानीं तस्योङ्कारालम्बनस्यात्मनस्साक्षात्स्वरूपनिर्दिधारयिषया इदमुच्यते—