अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 18

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥

na jāyate mriyate vā vipaścinnāyaṃ kutaścinna babhūva kaścit .
ajo nityaḥ śāśvato’yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre .. 18 ..


यह विपश्चित्—मेधावी आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है; यह न तो किसी अन्य कारण से ही उत्पन्न हुआ है और न स्वतः ही कुछ [अर्थान्तररूप से] बना है । यह अजन्मा, नित्य (सदा से वर्तमान) शाश्वत (सर्वदा रहनेवाला) और पुरातन है तथा शरीर के मारे जाने पर भी स्वयं नहीं मरता ॥ १८ ॥

यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता और न मरता ही है । उत्पन्न होनेवाली अनित्य वस्तु के अनेक विकार होते हैं । यहाँ—आत्मा में सब विकारों का प्रतिषेध करने के लिये ‘न जायते म्रियते वा’ ऐसा कहकर सबसे पहले उनमें से जन्म और विनाशरूप आदि और अन्त के विकारों का निषेध किया जाता है । कभी लुप्त न होनेवाले चैतन्यरूप स्वभाव के कारण आत्मा विपश्चित् यानी मेधावी है ।

तथा यह आत्मा कहीं से अर्थात् किसी अन्य कारण से उत्पन्न नहीं हुआ और न अर्थान्तररूप से स्वयं अपने से ही हुआ है । इसलिये यह आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत—यानी क्षयरहित है, क्योंकि जो अशाश्वत होता है वही क्षीण हुआ करता है । यह तो शाश्वत है, इसलिये पुराण भी है यानी प्राचीन होकर भी नवीन ही है । क्योंकि जो पदार्थ अवयवों के उपचय (मेल) - से निष्पन्न किया जाता है वही ‘इस समय नया है’ ऐसा कहा जाता है; जैसे घड़ा । किन्तु आत्मा उससे विपरीत स्वभाववाला है; अर्थात् वह पुराण यानी वृद्धिरहित है ।

क्योंकि ऐसा है; इसलिये शस्त्रादिद्वारा शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मरता—उसकी हिंसा नहीं होती । अर्थात् शरीर में रहकर भी वह आकाश के समान निर्लिप्त ही है ॥ १८ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

न जायते नोत्पद्यते म्रियते वा न म्रियते चोत्पत्तिमतो वस्तुनोऽनित्यस्य अनेकविक्रियास्तासामाद्यन्ते जन्मविनाशलक्षणे विक्रिये इहात्मनि प्रतिषिध्येते प्रथमं सर्वविक्रियाप्रतिषेधार्थं न जायते म्रियते वेति । विपश्चिन्मेधावी, अविपरिलुप्तचैतन्यस्वभावात् ।

किं च नायमात्मा कुतश्चित् कारणान्तराद्बभूव । स्वस्माच्च आत्मनो न बभूव कश्चिदर्थान्तरभूतः । अतोऽयमात्माऽजो नित्यः शाश्वतोऽपक्षयविवर्जितः । यो ह्यशाश्वतः सोऽपक्षीयते; अयं तु शाश्वतोऽत एव पुराणः पुरापि नव एवेति । यो ह्यवयवोपचयद्वारेणाभिनिर्वर्त्यते स इदानीं नवो यथा कुम्भादिः । तद्विपरीतस्त्वात्मा पुराणो वृद्धिविवर्जित इत्यर्थः ।

यत एवमतो न हन्यते न हिंस्यते हन्यमाने शस्त्रादिभिः शरीरे । तत्स्थोऽप्याकाशवदेव ॥ १८ ॥