हन्ता चेन्मन्यते हन्तुग्ँ हतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायग्ँ हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
उभौ तौ न विजानीतो नायग्ँ हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
hantā cenmanyate hantug̐ hataścenmanyate hatam .
ubhau tau na vijānīto nāyag̐ hanti na hanyate .. 19 ..
यदि मारनेवाला आत्मा को मारने का विचार करता है और मारा जानेवाला उसे मारा हुआ समझता है तो वे दोनों ही उसे नहीं जानते, क्योंकि यह न तो मारता है और न मारा जाता है ॥ १९ ॥
ऐसे प्रकार के आत्मा को भी जो देहमात्र को ही आत्मा समझनेवाला किसी को मारनेवाला पुरुष यदि किसी को मारने का विचार करता है—यह सोचता है कि मैं इसे मारूँगा, तथा दूसरा मारा जानेवाला भी यह समझकर कि ‘मैं मारा गया हूँ’ अपने (आत्मा) - को मारा गया मानता है तो वे दोनों ही अपने आत्मा को नहीं जानते; क्योंकि आत्मा अविकारी है, इसलिये वह मार नहीं सकता और आकाश के समान अविकारी होने से ही मारा भी नहीं जा सकता । अतः धर्माधर्मादिरूप संसार अनात्मज्ञ से ही सम्बन्ध रखता है, ब्रह्मज्ञ से नहीं । क्योंकि श्रुतिप्रमाण और युक्ति से भी ब्रह्मज्ञानीद्वारा धर्म-अधर्म आदि नहीं बन सकते ॥ १९ ॥
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एवं भूतमप्यात्मानं शरीरमात्रात्मदृष्टिर्हन्ता चेद्यदि मन्यते चिन्तयति हन्तुं हनिष्याम्येनम् इति योऽप्यन्यो हतः सोऽपि चेन्मन्यते हतमात्मानं हतोऽहम् इत्युभावपि तौ न विजानीतः, स्वमात्मानं यतो नायं हन्ति अविक्रियत्वादात्मनस्तथा न हन्यत आकाशवदविक्रियत्वादेव । अतोऽनात्मज्ञविषय एव धर्माधर्मादिलक्षणः संसारो न ब्रह्मज्ञस्य । श्रुतिप्रामाण्यान्न्यायाच्च धर्माधर्माद्यनुपपत्तेः ॥ १९ ॥
तो फिर मुमुक्षु पुरुष आत्मा को किस रूप से जानता है? इस पर कहते हैं—
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कथं पुनरात्मानं जानाति इत्युच्यते—