अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 2

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २ ॥

śreyaśca preyaśca manuṣyametastau samparītya vivinakti dhīraḥ .
śreyo hi dhīro’bhi preyaso vṛṇīte preyo mando yogakṣemādvṛṇīte .. 2 ..


श्रेय और प्रेय [परस्पर मिले हुए-से होकर] मनुष्य के पास आते हैं । उन दोनों को बुद्धिमान् पुरुष भली प्रकार विचारकर अलग-अलग करता है । विवेकी पुरुष प्रेय के सामने श्रेय को ही वरण करता है; किन्तु मूढ योग-क्षेम के निमित्त से प्रेय को वरण करता है ॥ २ ॥

वे मनुष्य के अधीन हैं—यह बात ठीक है । तथापि वे श्रेय और प्रेय मन्दबुद्धि पुरुषों के लिये साधन और फलदृष्टि से जिनका पार्थक्य करना बहुत कठिन है ऐसे होकर परस्पर मिले हुएसे ही मनुष्य यानी इस जीव को प्राप्त होते हैं । अतः हंस जिस प्रकार जल से दूध अलग कर लेता है उसी प्रकार धीर—बुद्धिमान् पुरुष उन श्रेय और प्रेय पदार्थों का भली प्रकार परिगमन कर—मन से उनकी आलोचना कर उनके गौरव और लाघव का विवेक यानी पृथक्करण करता है । इस प्रकार श्रेय का विवेचन कर वह प्रेय की अपेक्षा अधिक अभीष्ट होने के कारण श्रेय को ही ग्रहण करता है । परन्तु ऐसा करता कौन है? वही जो बुद्धिमान् है ।

इसके विपरीत जो मन्द—अल्प बुद्धि है, वह विवेकशक्ति का अभाव होने के कारण, जो योग-क्षेम का ही कारण है अर्थात् जो शरीरादि की वृद्धि और रक्षा का ही निमित्त है उस पशु-पुत्रादिरूप प्रेय को ही वरण करता है ॥ २ ॥

तात्पर्य पढ़ें

सत्यं स्वायत्ते तथापि साधनतः फलतश्च मन्दबुद्धीनां दुर्विवेकरूपे सती व्यामिश्रीभूते इव मनुष्यमेतं पुरुषमा इतः प्राप्नुतः श्रेयश्च प्रेयश्च । अतो हंस इवाम्भसः पयस्तौ श्रेयःप्रेयःपदार्थौ सम्परीत्य सम्यक्परिगम्य मनसालोच्य गुरुलाघवं विविनक्ति पृथक्करोति धीरो धीमान् । विविच्य च श्रेयो हि श्रेय एवाभिवृणीते प्रेयसोऽभ्यर्हितत्वात् । कोऽसौ धीरः ।

यस्तु मन्दोऽल्पबुद्धिः स विवेकासामर्थ्याद्योगक्षेमाद्योगक्षेमनिमित्तं शरीराद्युपचयरक्षणनिमित्तमित्येतत्प्रेयः पशुपुत्रादिलक्षणं वृणीते ॥ २ ॥