तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥
aṇoraṇīyānmahato mahīyānātmāsya jantornihito guhāyām .
tamakratuḥ paśyati vītaśoko dhātuprasādānmahimānamātmanaḥ .. 20 ..
आत्मा अणु से भी अणु अर्थात् श्यामाक आदि सूक्ष्म पदार्थों से भी सूक्ष्मतर तथा महान् से भी महान् यानी पृथिवी आदि महत्परिमाणवाले पदार्थों से भी महत्तर है । संसार में अणु अथवा महत्परिमाणवाली जो कुछ वस्तु है वह उस नित्यस्वरूप आत्मा से ही आत्मवान् (स्वरूपसत्तायुक्त) हो सकती है । आत्मा से परित्यक्त हो जाने पर वह सत्ताशून्य हो जाती है । अतः यह आत्मा ही अणु-से-अणु और महान्-से-महान् है, क्योंकि नाम-रूपवाली सभी वस्तुएँ इसकी उपाधि हैं । वह आत्मा ही ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त इस सम्पूर्ण प्राणि-समुदाय की गुहा— हृदय में निहित है अर्थात् अन्तरात्मरूप से स्थित है ।
देखना, सुनना, मनन करना और जानना—ये जिसके लिङ्ग हैं उस आत्मा को अक्रतु—निष्काम पुरुष अर्थात् जिसकी बुद्धि दृष्ट और अदृष्ट बाह्य विषयों से उपरत हो गयी है, क्योंकि जिस समय ऐसी स्थिति होती है उसी समय मन आदि इन्द्रियाँ, जो कि शरीर को धारण करने के कारण धातु कहलाती हैं, प्रसन्न होती हैं—सो, इन धातुओं के प्रसाद से वह अपने आत्मा की कर्मनिमित्तक वृद्धि और क्षय से रहित महिमा को देखता है; अर्थात् इस बात को साक्षात् जानता है कि ‘मैं यह हूँ’ । [ऐसा जानकर] फिर वह शोकरहित हो जाता है ॥ २० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अणोः सूक्ष्मादणीयाञ्श्यामाकादेरणुतरः । महतो महत्परिमाणान्महीयान्महत्तरः पृथिव्यादेः । अणु महद्वा यदस्ति लोके वस्तु तत्तेनैवात्मना नित्येन आत्मवत्सम्भवति । तदात्मना विनिर्मुक्तमसत्सम्पद्यते । तस्माद् असावेवात्माणोरणीयान्महतो महीयान्सर्वनामरूपवस्तूपाधिकत्वात् । स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य प्राणिजातस्य गुहायां हृदये निहित आत्मभूतः स्थित इत्यर्थः ।
तमात्मानं दर्शनश्रवणमननविज्ञानलिङ्गमक्रतुरकामो दृष्टादृष्टबाह्यविषयोपरतबुद्धिरित्यर्थः— यदा चैवं तदा मन आदीनि करणानि धातवः शरीरस्य धारणात्प्रसीदन्तीत्येषां धातूनां प्रसादादात्मनो महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षयरहितं पश्यत्ययम् अहमस्मीति साक्षाद्विजानाति । ततो वीतशोको भवति ॥ २० ॥