कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥
āsīno dūraṃ vrajati śayāno yāti sarvataḥ .
kastaṃ madāmadaṃ devaṃ madanyo jñātumarhati .. 21 ..
आसीन—अवस्थित अर्थात् अचल होकर भी वह दूर चला जाता है तथा शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है । इस प्रकार वह आत्मा—देव समद और अमद यानी हर्षसहित और हर्षरहित—विरुद्ध धर्मवाला है । अतः जानने में न आ सकने के कारण उस मदयुक्त और मदरहित देव को मेरे सिवा और कौन जान सकता है?
यह आत्मा हम-जैसे सूक्ष्मबुद्धि विद्वानों के लिये ही सुविज्ञेय है । स्थिति-गति तथा नित्य और अनित्य आदि अनेक विरुद्धधर्मरूप उपाधिवाला तथा विपरीतधर्मयुक्त होने से यह चिन्तामणि के समान विश्वरूप-सा भासता है । अतः ‘मेरे सिवा उसे और कौन जानने योग्य है’ ऐसा कहकर उसकी दुर्विज्ञेयता दिखलाते हैं ।
इन्द्रियों का शान्त हो जाना शयन है । शयन करनेवाले पुरुष का इन्द्रियजनित एकदेशसम्बन्धी विज्ञान शान्त हो जाता है । जिस समय ऐसी अवस्था होती है उस समय केवल सामान्य विज्ञान होने से वह सब ओर जाता हुआ-सा जान पड़ता है; और जब वह विशेष विज्ञान में स्थित होता है तो स्वरूप से अविचल रहकर भी मन आदि उपाधियोंवाला होने से उन मन आदि की गतियों में जाता हुआ-सा जान पड़ता है । वस्तुतः तो वह यहीं रहता है ॥ २१ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
आसीनोऽवस्थितोऽचल एव सन् दूरं व्रजति । शयानो याति सर्वत एवमसावात्मा देवो मदामदः समदोऽमदश्च सहर्षोऽहर्षश्च विरुद्धधर्मवानतोऽशक्यत्वाज्ज्ञातुं कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति?
अस्मदादेरेव सूक्ष्मबुद्धेः पण्डितस्य सुविज्ञेयोऽयमात्मा स्थितिगतिनित्यानित्यादिविरुद्धानेकधर्मोपाधिकत्वाद्विरुद्धधर्मवत्त्वाद्विश्वरूप इव चिन्तामणिव- दवभासते । अतो दुर्विज्ञेयत्वं दर्शयति कस्तं मदन्यो ज्ञातुमर्हतीति ।
करणानामुपशमः शयन करणजनितस्यैकदेशविज्ञानस्य उपशमः शयानस्य भवति । यदा चैवं केवलसामान्यविज्ञानत्वात् सर्वतो यातीव यदा विशेषविज्ञानस्थः स्वेन रूपेण स्थित एव सन्मनआदिगतिषु तदुपाधिकत्वाद्दूरं व्रजतीव । स चेहैव वर्तते ॥ २१ ॥