अशरीरग्ँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥
aśarīrag̐ śarīreṣvanavastheṣvavasthitam .
mahāntaṃ vibhumātmānaṃ matvā dhīro na śocati .. 22 ..
जो शरीरों में शरीररहित तथा अनित्यों में नित्यस्वरूप है उस महान् और सर्वव्यापक आत्मा को जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ २२ ॥
आत्मा अपने स्वरूप से आकाश के समान है, अतः देव, पितृ और मनुष्यादि शरीरों में अशरीर है, अनवस्थित—अवस्थितरहित यानी अनित्यों में अवस्थित—नित्य अर्थात् अविकारी है, तथा महान् है—[किससे महान् है—
इस प्रकार] महत्त्व में इतर की अपेक्षा होने की शङ्का करके कहते हैं उस विभु अर्थात् व्यापक आत्मा को जानकर— यहाँ ‘आत्मा’ शब्द अपने से ब्रह्म की अभिन्नता दिखाने के लिये लिया गया है, क्योंकि ‘आत्मा’ शब्द प्रत्यगात्मविषय में ही मुख्य है—ऐसे उस आत्मा को ‘यही मैं हूँ’ ऐसा जानकर धीर—बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योंकि इस प्रकार के आत्मवेत्ता में शोक बन ही नहीं सकता ॥ २२ ॥
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अशरीरं स्वेन रूपेण आकाशकल्प आत्मा तमशरीरं शरीरेषु देवपितृमनुष्यादिशरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थितरहितेष्ववस्थितं नित्यमविकृतमित्येतत्, महान्तं महत्त्वस्यापेक्षिकत्वशङ्कायामाह— विभुं व्यापिनमात्मानम्—आत्मग्रहणं स्वतोऽनन्यत्वप्रदर्शनार्थम्, आत्मशब्दः प्रत्यगात्मविषय एव मुख्यस्तमीदृशमात्मानं मत्वा अयमहमिति धीरो धीमान्न शोचति । न ह्येवंविधस्यात्मविदः शोकोपपत्तिः ॥ २२ ॥
यद्यपि यह आत्मा दुर्विज्ञेय है तो भी उपाय करने से तो सुविज्ञेय ही है; इस पर कहते हैं—
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यद्यपि दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा तथाप्युपायेन सुविज्ञेय एवेत्याह—