अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 23

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूग्ँ स्वाम् ॥ २३ ॥

nāyamātmā pravacanena labhyo na medhayā na bahunā śrutena .
yamevaiṣa vṛṇute tena labhyastasyaiṣa ātmā vivṛṇute tanūg̐ svām .. 23 ..


यह आत्मा वेदाध्ययनद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है और न धारणाशक्ति अथवा अधिक श्रवण से ही प्राप्त हो सकता है । यह [साधक] जिस [आत्मा] - का वरण करता है, उस [आत्मा] - से ही यह प्राप्त किया जा सकता है । उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूप को अभिव्यक्त कर देता है ॥ २३ ॥

यह आत्मा प्रवचन अर्थात् अनेकों वेदों को स्वीकार करने से प्राप्त यानी विदित होने योग्य नहीं है, न मेधा यानी ग्रन्थार्थ-धारण की शक्ति से ही जाना जा सकता है और न केवल बहुत-सा श्रवण करने से ही । तो फिर किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है, इस पर कहते हैं—

यह साधक जिस अपने आत्मा का वरण—प्रार्थना करता है उस वरण करनेवाले आत्मा द्वारा यह आत्मा स्वयं ही प्राप्त किया जाता है—अर्थात् उससे ही ‘यह ऐसा है’ इस प्रकार जाना जाता है । तात्पर्य यह कि केवल आत्मलाभ के लिये ही प्रार्थना करनेवाले निष्काम पुरुष को आत्मा के द्वारा ही आत्मा की उपलब्धि होती है ।

किस प्रकार उपलब्ध होता है, इस पर कहते हैं—उस आत्मकामी के प्रति यह आत्मा अपने पारमार्थिक स्वरूप अर्थात् अपने याथात्म्य को विवृत—प्रकाशित कर देता है ॥ २३ ॥

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नायमात्मा प्रवचनेनानेकवेदस्वीकरणेन लभ्यो ज्ञेयो नापि मेधया ग्रन्थार्थधारणशक्त्या । न बहुना श्रुतेन केवलेन । केन तर्हि लभ्य इत्युच्यते—

यमेव स्वात्मानमेष साधको वृणुते प्रार्थयते तेनैवात्मना वरित्रा स्वयमात्मा लभ्यो ज्ञायत एवमित्येतत् । निष्कामस्यात्मानम् एव प्रार्थयत आत्मनैवात्मा लभ्यत इत्यर्थः ॥

कथं लभ्यत इत्युच्यते— तस्यात्मकामस्यैष आत्मा विवृणुते प्रकाशयति पारमार्थिकीं तनूं स्वां स्वकीयां स्वयाथात्म्यम् इत्यर्थः ॥ २३ ॥


इसके सिवा दूसरी बात यह भी है—
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किं चान्यत्—