अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 24

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥

nāvirato duścaritānnāśānto nāsamāhitaḥ .
nāśāntamānaso vāpi prajñānenainamāpnuyāt .. 24 ..


जो पापकर्मों से निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त असमाहित या अशान्त है वह इसे आत्मज्ञानद्वारा प्राप्त नहीं कर सकता है ॥ २४ ॥
जो दुश्चरित—प्रतिषिद्ध कर्म यानी श्रुति-स्मृति से अविहित पापकर्म से अविरत—अनुपरत है वह नहीं, जो इन्द्रियों की चञ्चलता के कारण अशान्त यानी उपरतिशून्य है वह भी नहीं, जो असमाहित अर्थात् जिसका चित्त एकाग्र नहीं है—जो विक्षिप्तचित्त है वह भी नहीं, तथा समाहितचित्त होने पर भी उस एकाग्रता के फल का इच्छुक होने के कारण जो अशान्तचित्त है—जिसका चित्त निरन्तर व्यापार करता रहता है वह पुरुष भी इस प्रस्तुत आत्मा को केवल आत्मज्ञानद्वारा नहीं प्राप्त कर सकता । अर्थात् जो पापकर्म और इन्द्रियों की चञ्चलता से हटा हुआ तथा समाहितचित्त और उस समाधान के फल से भी उपशान्तमना है वह आचार्यवान् साधक ही ब्रह्मज्ञानद्वारा उपर्युक्त आत्मा को प्राप्त कर सकता है ॥ २४ ॥
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न दुश्चरितात्प्रतिषिद्धाच्छ्रुतिस्मृत्यविहितात्पापकर्मणोऽविरतः—अनुपरतो नापीन्द्रियलौल्याद् अशान्तोऽनुपरतो नाप्यसमाहितोऽनेकाग्रमना विक्षिप्तचित्तः, समाहितचित्तोऽपि सन्समाधानफलार्थित्वान्नाप्यशान्तमानसो व्यापृतचित्तः प्रज्ञानेन ब्रह्मविज्ञानेनैनं प्रकृतमात्मानमाप्नुयात् । यस्तु दुश्चरिताद्विरत इन्द्रियलौल्याच्च समाहितचित्तः समाधानफलादप्युपशान्तमानसश्चाचार्यवान्प्रज्ञानेन यथोक्तम् आत्मानं प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ २४ ॥

किन्तु जो (साधक) ऐसा नहीं है [उसके विषय में श्रुति कहती है—]
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यस्त्वनेवंभूतः—