अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 25

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥

yasya brahma ca kṣatraṃ ca ubhe bhavata odanaḥ .
mṛtyuryasyopasecanaṃ ka itthā veda yatra saḥ .. 25 ..


जिस आत्मा के ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ओदन—भात हैं तथा मृत्यु जिसका उपसेचन (शाकादि) है वह जहाँ है उसे कौन [अज्ञ पुरुष] इस प्रकार (उपर्युक्त साधनसम्पन्न अधिकारी के समान) जान सकता है? ॥ २५ ॥
सम्पूर्ण धर्मों को धारण करनेवाले और सबके रक्षक होने पर भी ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों वर्ण जिस आत्मा के ओदन—भोजन हैं तथा सबका हरण करनेवाला होने पर भी मृत्यु जिसका भात के लिये उपसेचन (शाकादि)-के समान है, अर्थात् भोजन के लिये भी पर्याप्त नहीं है, उस आत्मा को, जहाँ कि वह है, ऐसा कौन पूर्वोक्त साधनों से रहित और साधारण बुद्धिवाला पुरुष है जो इस प्रकार—उपर्युक्त साधनसम्पन्न पुरुष के समान जान सके? ॥ २५ ॥
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यस्यात्मनो ब्रह्मक्षत्रे सर्वधर्मविधारके अपि सर्वत्राणभूते उभे ओदनोऽशनं भवतः स्याताम्, सर्वहरोऽपि मृत्युर्यस्योपसेचनम् इवौदनस्य, अशनत्वेऽप्यपर्याप्तस्तं प्राकृतबुद्धिर्यथोक्तसाधनरहितः सन् क इत्था इत्थमेवं यथोक्तसाधनवानिवेत्यर्थः, वेद विजानाति यत्र स आत्मेति ॥ २५ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ २ ॥

तृतीया वल्ली

प्राप्ता और प्राप्तव्य भेद से दो आत्मा

इस ‘ऋतं पिबन्तौ’ इत्यादि तृतीया वल्ली का सम्बन्ध इस प्रकार है—

ऊपर विद्या और अविद्या नाना प्रकार के विरुद्ध धर्मोंवाली बतलायी गयी हैं; किन्तु उनका फलसहित यथावत् निर्णय नहीं किया गया । उनका निर्णय करने के लिये ही [इस वल्ली में] रथ के रूपक की कल्पना की गयी है । ऐसा करने से उन्हें [अर्थात् विद्या-अविद्या को] समझने में सुगमता हो जाती है । इसी प्रकार प्राप्त होनेवाले और प्राप्तव्य स्थान तथा गमन करनेवाले और गन्तव्य लक्ष्य का विवेक करने के लिये दो आत्माओं का उपन्यास करते हैं—

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ऋतं पिबन्तावित्यस्या वल्ल्याः सम्बन्धः—

विद्याविद्ये नानाविरुद्धफले इत्युपन्यस्ते न तु सफले ते यथावन्निर्णीते; तन्निर्णयार्था रथरूपककल्पना, तथा च प्रतिपत्तिसौकर्यम् । एवं च प्राप्तृप्राप्यगन्तृगन्तव्यविवेकार्थं द्वावात्मानौ उपन्यस्येते—