अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 3

स त्वं प्रियान्प्रियरूपाग्ँश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।
नैताग्ँसृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥

sa tvaṃ priyānpriyarūpāg̐śca kāmānabhidhyāyannaciketo’tyasrākṣīḥ .
naitāg̐sṛṅkāṃ vittamayīmavāpto yasyāṃ majjanti bahavo manuṣyāḥ .. 3 ..


हे नचिकेतः! उस तूने पुत्र-वित्तादि प्रिय और अप्सरा आदि प्रियरूप भोगों को, उनका असारत्व चिन्तन करके त्याग दिया है और जिसमें बहुत से मनुष्य डूब जाते हैं, उस इस धनप्राया निन्दित गति को तू प्राप्त नहीं हुआ ॥ ३ ॥
हे नचिकेतः! तेरी बुद्धिमत्ता धन्य है; जिस तूने कि मेरे द्वारा बारम्बार प्रलोभित किये जाने पर भी पुत्रादि प्रिय तथा अप्सरा आदि प्रियरूप भोगों को, उनकी अनित्यता और असारता आदि दोषों का विचार करके परित्याग कर दिया, और जिसमें मूढ पुरुष प्रवृत्त हुआ करते हैं उस वित्तमयी—धनप्राया निन्दित गति को तू प्राप्त नहीं हुआ, जिस मार्ग में कि बहुत-से मूढ पुरुष डूब जाते अर्थात् दुःख उठाते हैं ॥ ३ ॥
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स त्वं पुनः पुनर्मया प्रलोभ्यमानोऽपि प्रियान् पुत्रादीन् प्रियरूपांश्चाप्सरःप्रभृतिलक्षणान् कामानभिध्यायंश्चिन्तयंस्तेषामनित्यत्वासारत्वादिदोषान् हे नचिकेतोऽत्यस्राक्षीरतिसृष्टवान् परित्यक्तवानस्यहो बुद्धिमत्ता तव । नैतामवाप्तवानसि सृङ्कां सृतिं कुत्सितां मूढजनप्रवृत्तां वित्तमयीं धनप्रायाम् । यस्यां सृतौ मज्जन्ति सीदन्ति बहवोऽनेके मूढा मनुष्याः ॥ ३ ॥

‘उनमें से श्रेय को ग्रहण करनेवाले का शुभ होता है और जो प्रेय को वरण करता है वह स्वार्थ से पतित हो जाता है’ ऐसा जो ऊपर (इस वल्ली के प्रथम मन्त्र में) कहा गया है, सो क्यों? [इसपर यमराज कहते हैं, ] क्योंकि—
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तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीत इत्युक्तं तत्कस्माद्यतः—