अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 4

दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥

dūramete viparīte viṣūcī avidyā yā ca vidyeti jñātā .
vidyābhīpsinaṃ naciketasaṃ manye na tvā kāmā bahavo’lolupanta .. 4 ..


जो विद्या और अविद्यारूप से जानी गयी हैं वे दोनों अत्यन्त विरुद्ध स्वभाववाली और विपरीत फल देनेवाली हैं । मैं तुझ नचिकेता को विद्याभिलाषी मानता हूँ, क्योंकि तुझे बहुत-से भोगों ने भी नहीं लुभाया ॥ ४ ॥

ये दोनों प्रकाश और अन्धकार के समान विवेक और अविवेकरूप होने से ‘दूरम्’ अर्थात् महान् अन्तर के साथ विपरीत हैं—आपस में एक-दूसरे से व्यावृत्तरूप हैं । और विषूची अर्थात् नाना गतिवाले हैं यानी संसार और मोक्ष के कारण होने से विभिन्न फलयुक्त हैं ।

वे कौन हैं—इसपर कहते हैं—‘जो कि पण्डितों द्वारा प्रेय को विषय करनेवाली अविद्या तथा श्रेयोविषया विद्यारूप से जानी गयी हैं । उनमें तुझ नचिकेता को मैं विद्याभिलाषी अर्थात् विद्यार्थी मानता हूँ । क्यों मानता हूँ? क्योंकि अविवेकियों की बुद्धि को प्रलोभित करनेवाले अप्सरा आदि बहुत-से भोग भी तुम्हें लुभा नहीं सके—उन्होंने तेरे हृदय में अपने भोग की इच्छा उत्पन्न करके तुझे श्रेयोमार्ग से विचलित नहीं किया । अतः मैं तुझे विद्यार्थी यानी श्रेय का पात्र समझता हूँ—यह इसका अभिप्राय है ॥ ४ ॥ '

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दूरं दूरेण महतान्तरेणैते विपरीते अन्योन्यव्यावृत्तरूपेविवेकाविवेकात्मकत्वात्तमःप्रकाशाविव । विषूची विषूच्यौ नानागती भिन्नफले संसारमोक्षहेतुत्वेनेत्येतत् ।

के ते इत्युच्यते । या चाविद्या प्रेयोविषया विद्येति च श्रेयोविषया ज्ञाता निर्ज्ञातावगता पण्डितैः । तत्र विद्याभीप्सिनं विद्यार्थिनं नचिकेतसं त्वामहं मन्ये । कस्माद्यस्मादविद्वद्बुद्धिप्रलोभिनः कामा अप्सरःप्रभृतयो बहवोऽपि त्वा त्वां नालोलुपन्त न विच्छेदं कृतवन्तः श्रेयोमार्गादात्मोपभोगाभिवाञ्छासम्पादनेन । अतो विद्यार्थिनं श्रेयोभाजनं मन्य इत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥


अविद्याग्रस्तों की दुर्दशा

किन्तु जो संसार के पात्र हैं—
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ये तु संसारभाजनाः—