अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 5

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥

avidyāyāmantare vartamānāḥ svayaṃ dhīrāḥ paṇḍitammanyamānāḥ .
dandramyamāṇāḥ pariyanti mūḍhā andhenaiva nīyamānā yathāndhāḥ .. 5 ..


वे अविद्या के भीतर रहनेवाले, अपने-आप बड़े बुद्धिमान् बने हुए और अपने को पण्डित माननेवाले मूढ पुरुष, अन्धे से ही ले जाये जाते हुए अन्धे के समान अनेकों कुटिल गतियों की इच्छा करते हुए भटकते रहते हैं ॥ ५ ॥
वे घनीभूत अन्धकार के समान अविद्या के भीतर स्थित हो पुत्र-पशु आदि सैकड़ों तृष्णापाशों से बँधे हुए [व्यवहार में लगे रहते हैं] । जिस प्रकार अन्धे यानी दृष्टिहीन पुरुष से विषम मार्ग में ले जाये जाते हुए बहुत-से अन्धे महान् अनर्थ को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार ‘हम बड़े धीर यानी बुद्धिमान् हैं और पण्डित अर्थात् शास्त्र-कुशल हैं’ इस प्रकार अपने को माननेवाले वे मूढ—अविवेकी पुरुष नाना प्रकार की अत्यन्त कुटिल गतियों की इच्छा करते हुए जरा, मरण और रोगादि दुःखों से सब ओर भटकते रहते हैं ॥ ५ ॥
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अविद्यायामन्तरे मध्ये घनीभूत इव तमसि वर्तमाना वेष्ट्यमानाः पुत्रपश्वादितृष्णापाशशतैः । स्वयं वयं धीराः प्रज्ञावन्तः पण्डिताः शास्त्रकुशलाश्चेति मन्यमानास्ते दन्द्रम्यमाणा अत्यर्थं कुटिलामनेकरूपां गतिम् इच्छन्तो जरामरणरोगादिदुःखैः परियन्ति परिगच्छन्ति मूढा अविवेकिनोऽन्धेनैव दृष्टिविहीनेनैव नीयमाना विषमे पथि यथा बहवोऽन्धा महान्तमनर्थमृच्छन्ति तद्वत् ॥ ५ ॥

अतएव मूढता के कारण—
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अत एव मूढत्वात्—