अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 6

न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥

na sāmparāyaḥ pratibhāti bālaṃ pramādyantaṃ vittamohena mūḍham .
ayaṃ loko nāsti para iti mānī punaḥ punarvaśamāpadyate me .. 6 ..


धन के मोह से अन्धे हुए और प्रमाद करनेवाले उस मूर्ख को परलोक का साधन नहीं सूझता । यह लोक है, परलोक नहीं है—ऐसा माननेवाला पुरुष बारम्बार मेरे वश को प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

उसे साम्पराय भासित नहीं होता । देहपात के अनन्तर जिसके प्रति गमन किया जाय उसे साम्पराय—परलोक कहते हैं । उसकी प्राप्ति ही जिसका प्रयोजन है वह साधनविशेष शास्त्रीय साम्पराय है । वह बाल अर्थात् अविवेकी पुरुष के प्रति प्रकाशित नहीं होता, अर्थात् वह उसके चित्त के सम्मुख उपस्थित नहीं होता ।

तथा जो प्रमाद करनेवाला है— जिसका चित्त पुत्र-पशु आदि प्रयोजनों में आसक्त है और जो धन के मोह से अर्थात् धननिमित्तक अविवेक से मूढ यानी अज्ञान से आवृत है [उस मूढ को परलोक का साधन नहीं सूझा करता] । ‘यह जो स्त्री और अन्न-पानादिविशिष्ट दृश्यमान लोक है बस यही है, इससे अन्य और कोई [स्वर्गादि] लोक नहीं है’ जो पुरुष इस प्रकार माननेवाला है वह बारम्बार जन्म लेकर मुझ मृत्यु की अधीनता को प्राप्त होता है । अर्थात् वह जन्म-मरणादिरूप दुःखपरम्परा पर ही आरूढ रहता है । यह लोक प्रायः इसी प्रकार का है ॥ ६ ॥

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न साम्परायः प्रतिभाति । सम्पर ईयत इति साम्परायः परलोकस्तत्प्राप्तिप्रयोजनः साधनविशेषः शास्त्रीयः साम्परायः । स च बालमविवेकिनं प्रति न प्रतिभाति न प्रकाशते नोपतिष्ठत इत्येतत् ।

प्रमाद्यन्तं प्रमादं कुर्वन्तं पुत्रपश्वादिप्रयोजनेष्वासक्तमनसं तथा वित्तमोहेन वित्तनिमित्तेनाविवेकेन मूढं तमसाच्छन्नं सन्तम् । अयमेव लोको योऽयं दृश्यमानः स्त्र्यन्नपानादिविशिष्टो नास्ति परोऽदृष्टो लोक इत्येवं मननशीलो मानी पुनः पुनर्जनित्वा वशं मदधीनतामापद्यते मे मृत्योर्मम । जननमरणादिलक्षणदुःखप्रबन्धारूढ एव भवतीत्यर्थः । प्रायेण एवंविध एव लोकः ॥ ६ ॥


आत्मज्ञान की दुर्लभता

किन्तु जो तेरे समान श्रेय की इच्छावाला है ऐसा तो हजारों में कोई ही आत्मवेत्ता होता है; क्योंकि—
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यस्तु श्रेयोऽर्थी सहस्रेषु कश्चिदेवात्मविद्भवति त्वद्विधो यस्मात्—