अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 7

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥

śravaṇāyāpi bahubhiryo na labhyaḥ śṛṇvanto’pi bahavo yaṃ na vidyuḥ .
āścaryo vaktā kuśalo’sya labdhāścaryo jñātā kuśalānuśiṣṭaḥ .. 7 ..


जो बहुतों को तो सुनने के लिये भी प्राप्त होनेयोग्य नहीं है, जिसे बहुत-से सुनकर भी नहीं समझते उस आत्मतत्त्व का निरूपण करनेवाला भी आश्चर्यरूप है, उसको प्राप्त करनेवाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल आचार्य द्वारा उपदेश किया हुआ ज्ञाता भी आश्चर्यरूप है ॥ ७ ॥
जो आत्मा बहुतों को तो सुनने के लिये भी नहीं मिलता तथा दूसरे बहुत-से अभागी अशुद्धचित्त पुरुष जिस आत्मतत्त्व को सुनकर भी नहीं जान पाते । यही नहीं, इसका वक्ता भी आश्चर्य अर्थात् अद्भुत-सा ही है—वह भी अनेकों में कोई ही होता है । तथा सुनकर भी इस आत्मा का लब्धा (ग्रहण करनेवाला) तो अनेकों में कोई निपुण पुरुष ही होता है, क्योंकि जिसे [आत्मदर्शन में] कुशल आचार्य ने उपदेश किया हो ऐसा इसका ज्ञाता भी आश्चर्यरूप ही है ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
श्रवणायापि श्रवणार्थं श्रोतुम् अपि यो न लभ्य आत्मा बहुभिरनेकैः शृण्वन्तोऽपि बहवोऽनेकेऽन्ये यमात्मानं न विद्युर्न विदन्त्यभागिनोऽसंस्कृतात्मानो न विजानीयुः । किं चास्य वक्तापि आश्चर्योऽद्भुतवदेवानेकेषु कश्चिद् एव भवति । तथा श्रुत्वाप्यस्य आत्मनः कुशलो निपुण एवानेकेषु लब्धा कश्चिदेव भवति । यस्माद् आश्चर्यो ज्ञाता कश्चिदेव कुशलानुशिष्टः कुशलेन निपुणेन आचार्येणानुशिष्टः सन् ॥ ७ ॥

क्योंकि—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
कस्मात्—