अध्याय 1 वल्ली 2 - मन्त्र 9

नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।
यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥

naiṣā tarkeṇa matirāpaneyā proktānyenaiva sujñānāya preṣṭha .
yāṃ tvamāpaḥ satyadhṛtirbatāsi tvādṛṅno bhūyānnaciketaḥ praṣṭā .. 9 ..


हे प्रियतम! सम्यक् ज्ञान के लिये शुष्क तार्किक से भिन्न शास्त्रज्ञ आचार्य द्वारा कही हुई यह बुद्धि, जिसे कि तू प्राप्त हुआ है, तर्क द्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है । अहा! तू बड़ा ही सत्य धारणावाला है । हे नचिकेतः! हमें तेरे समान प्रश्न करनेवाला प्राप्त हो ॥ ९ ॥

अतः अभेददर्शी आचार्य द्वारा उपदेश किये हुए आत्मा में उत्पन्न हुई जो यह शास्त्रप्रतिपाद्य आत्मविषयक मति है वह तर्क से अर्थात् अपनी बुद्धि के ऊहापोहमात्र से प्राप्त होने योग्य नहीं है । अथवा [यह समझो कि] यह आत्मबुद्धि तर्कशक्ति से अपनेतव्य यानी छोड़ी जाने योग्य नहीं है, क्योंकि तार्किक तो अध्यात्मशास्त्र से अनभिज्ञ होता है, वह अपनी बुद्धि से कल्पना किया हुआ चाहे जो कहता रहता है । अतः हे प्रेष्ठ—प्रियतम! यह जो शास्त्रजनित आत्मबुद्धि है वह तो तार्किक से भिन्न किसी शास्त्रज्ञ आचार्य द्वारा उपदेश की जाने पर ही सम्यक् ज्ञान की कारण होती है ।

अच्छा तो, तर्क से प्राप्त न होने योग्य वह मति कौन-सी है? इसपर कहते हैं—

जिस मति को तूने मेरे वरप्रदान से प्राप्त किया है । जिस तेरी धृति सत्य अर्थात् यथार्थ पदार्थ को विषय करनेवाली है वह तू सत्यधृति है । ‘बत’ इस अव्यय से अनुकम्पा करते हुए यमराज आगे कहे जानेवाले विज्ञान की स्तुति के लिये नचिकेता से कहते हैं—‘हे नचिकेतः! हमें तेरे समान प्रश्न करनेवाला और भी पुत्र अथवा शिष्य मिले । परन्तु वह हो कैसा? जैसा कि तू प्रश्न करनेवाला है’ ॥ ९ ॥

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अतोऽनन्यप्रोक्त आत्मनि उत्पन्ना येयमागमप्रतिपाद्यात्ममतिर्नैषा तर्केण स्वबुद्ध्यभ्यूहमात्रेणापनेया न प्रापणीयेत्यर्थः । नापनेतव्या वा न हातव्या तार्किको ह्यनागमज्ञः स्वबुद्धिपरिकल्पितं यत्किञ्चिदेव कथयति । अत एव च येयमागमप्रभूता मतिरन्येनैवागमाभिज्ञेन आचार्येणैव तार्किकात्प्रोक्ता सती सुज्ञानाय भवति हे प्रेष्ठ प्रियतम ।

का पुनः सा तर्कागम्या मतिरित्युच्यते—

यां त्वं मतिं मद्वरप्रदानेन आपः प्राप्तवानसि । सत्या अवितथविषया धृतिर्यस्य तव स त्वं सत्यधृतिर्बतासीत्यनुकम्पयन्नाह मृत्युर्नचिकेतसं वक्ष्यमाणविज्ञानस्तुतये । त्वादृक्त्वत्तुल्यो नोऽस्मभ्यं भूयाद्भवताद्भवदन्यः पुत्रः शिष्यो वा प्रष्टा; कीदृग्यादृक्त्वं हे नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥


नचिकेता से प्रसन्न हुए मृत्यु ने फिर भी कहा—
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पुनरपि तुष्ट आह—