छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥
ṛtaṃ pibantau sukṛtasya loke guhāṃ praviṣṭau parame parārdhe .
chāyātapau brahmavido vadanti pañcāgnayo ye ca triṇāciketāḥ .. 1 ..
ऋत अर्थात् अवश्यम्भावी होने के कारण सत्य कर्मफल का पान करनेवाले दो आत्मा, जिनमें से केवल एक कर्मफल का पान—भोग करता है, दूसरा नहीं; तो भी पान करनेवाले से सम्बन्ध होने के कारण यहाँ छत्रिन्याय से[ * ] दोनों ही के लिये ‘पिबन्तौ’ इस द्विवचन का प्रयोग हुआ है, सुकृत अर्थात् अपने किये हुए कर्म के फल को भोगते हुए, यहाँ ‘सुकृतस्य’ शब्द का पूर्ववर्ती ‘ऋतम्’ शब्द के साथ सम्बन्ध है । लोक अर्थात् इस शरीर में गुहा-बुद्धि के भीतर परम—बाह्य देहाश्रित आकाश स्थान की अपेक्षा उत्कृष्ट परब्रह्म के अर्ध यानी स्थान में प्रवेश किये हुए हैं, क्योंकि उसी में परब्रह्म की उपलब्धि होती है । अतः तात्पर्य यह है कि उस परम परार्ध यानी हृदयाकाश में प्रवेश किये हुए हैं ।
> [ * ]: जहाँ बहुत-से आदमी जा रहे हों और उनमें से किसी एक के पास छाता हो तो दूर से देखनेवाला पुरुष उन्हें बतलाने के लिये ‘देखो, वे छातेवाले लोग जा रहे हैं’ ऐसे वाक्य का प्रयोग करता है । इस प्रकार एक छातेवाले से सम्बन्धित होने के कारण वह सारा समूह ही छातेवाला कहा जाता है । इसे ‘छत्रिन्याय’ कहते हैं । इसी प्रकार यहाँ भोक्ता जीव के सम्बन्ध से ईश्वर को भी भोक्ता कहा गया है ।
वे दोनों संसारी और असंसारी होने के कारण छाया और धूप के समान परस्पर विलक्षण हैं—ऐसा ब्रह्मवेत्तालोग वर्णन करते—कहते हैं । [इस प्रकार] केवल अकर्मी ही ऐसा नहीं कहते बल्कि जो त्रिणाचिकेत हैं—जिन्होंने तीन बार नाचिकेत अग्नि का चयन किया है वे पञ्चाग्नि की उपासना करनेवाले गृहस्थ भी ऐसा ही कहते हैं ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ऋतं सत्यमवश्यंभावित्वात् कर्मफलं पिबन्तौ, एकस्तत्र कर्मफलं पिबति भुङ्क्ते नेतरः; तथापि पातृसम्बन्धात्पिबन्तौ इत्युच्यते छत्रिन्यायेन, सुकृतस्य स्वयंकृतस्य कर्मण ऋतम् इति पूर्वेण सम्बन्धः; लोकेऽस्मिन् शरीरे गुहां गुहायां बुद्धौ प्रविष्टौ, परमे बाह्यपुरुषाकाशसंस्थानापेक्षया परमम्, परस्य ब्रह्मणोऽर्धं स्थानं परार्धम् । तस्मिन्हि परं ब्रह्मोपलभ्यते, अतस्तस्मिन्परमे परार्धे हार्दाकाशे प्रविष्टावित्यर्थः ।
तौ च छायातपाविव विलक्षणौ संसारित्वासंसारित्वेन ब्रह्मविदो वदन्ति कथयन्ति । न केवलमकर्मिण एव वदन्ति । पञ्चाग्नयो गृहस्था ये च त्रिणाचिकेताः—त्रिःकृत्वो नाचिकेतोऽग्निश्चितो यैस्ते त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥