मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १० ॥
indriyebhyaḥ parā hyarthā arthebhyaśca paraṃ manaḥ .
manasastu parā buddhirbuddherātmā mahānparaḥ .. 10 ..
इन्द्रियाँ तो स्थूल हैं । वे जिन शब्दस्पर्शादि विषयों द्वारा अपने को प्रकाशित करने के लिये बनायी गयी हैं वे विषय अपने कार्यभूत इन्द्रियवर्ग से पर—सूक्ष्म, महान् एवं प्रत्यगात्मस्वरूप हैं ।
उन विषयों से भी पर—सूक्ष्म, महान् तथा नित्यस्वरूपभूत मन है, जो कि ‘मन’ शब्द का वाच्य और मन का आरम्भक भूतसूक्ष्म है, क्योंकि वही सङ्कल्प-विकल्पादि का आरम्भक है । मन से भी पर—सूक्ष्मतर, महत्तर एवं प्रत्यगात्मभूत ‘बुद्धि’ शब्दवाच्य अध्यवसायादि का आरम्भक भूतसूक्ष्म है । उस बुद्धि से भी, सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धि का प्रत्यगात्मभूत होने से आत्मा महान् है, क्योंकि वह सबसे बड़ा है । अर्थात् अव्यक्त से जो सबसे पहले उत्पन्न हुआ हिरण्यगर्भ तत्त्व है, जो महान् आत्मा [ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति से सम्पन्न होने के कारण] बोधाबोधात्मक है वह बुद्धि से भी पर है—ऐसा कहा जाता है ॥ १० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स्थूलानि तावदिन्द्रियाणि तानि यैरर्थैरात्मप्रकाशनाय आरब्धानि तेभ्य इन्द्रियेभ्यः स्वकार्येभ्यस्ते परा ह्यर्थाः सूक्ष्मा महान्तश्च प्रत्यगात्मभूताश्च ।
तेभ्योऽप्यर्थेभ्यश्च परं सूक्ष्मतरं महत्प्रत्यगात्मभूतं च मनः । मनःशब्दवाच्यं मनस आरम्भकं भूतसूक्ष्मं सङ्कल्पविकल्पाद्यारम्भकत्वात् । मनसोऽपि परा सूक्ष्मतरा महत्तरा प्रत्यगात्मभूता च बुद्धिः, बुद्धिशब्दवाच्यमध्यवसायाद्यारम्भकं भूतसूक्ष्मम् । बुद्धेरात्मा सर्वप्राणिबुद्धीनां प्रत्यगात्मभूतत्वादात्मा महान्सर्वमहत्त्वात् । अव्यक्ताद्यत्प्रथमं जातं हैरण्यगर्भं तत्त्वं बोधाबोधात्मकं महानात्मा बुद्धेः पर इत्युच्यते ॥ १० ॥