अध्याय 1 वल्ली 3 - मन्त्र 10

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १० ॥

indriyebhyaḥ parā hyarthā arthebhyaśca paraṃ manaḥ .
manasastu parā buddhirbuddherātmā mahānparaḥ .. 10 ..


इन्द्रियों की अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयों से मन उत्कृष्ट है, मन से बुद्धि पर है और बुद्धि से भी महान् आत्मा (महत्तत्त्व) उत्कृष्ट है ॥ १० ॥

इन्द्रियाँ तो स्थूल हैं । वे जिन शब्दस्पर्शादि विषयों द्वारा अपने को प्रकाशित करने के लिये बनायी गयी हैं वे विषय अपने कार्यभूत इन्द्रियवर्ग से पर—सूक्ष्म, महान् एवं प्रत्यगात्मस्वरूप हैं ।

उन विषयों से भी पर—सूक्ष्म, महान् तथा नित्यस्वरूपभूत मन है, जो कि ‘मन’ शब्द का वाच्य और मन का आरम्भक भूतसूक्ष्म है, क्योंकि वही सङ्कल्प-विकल्पादि का आरम्भक है । मन से भी पर—सूक्ष्मतर, महत्तर एवं प्रत्यगात्मभूत ‘बुद्धि’ शब्दवाच्य अध्यवसायादि का आरम्भक भूतसूक्ष्म है । उस बुद्धि से भी, सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धि का प्रत्यगात्मभूत होने से आत्मा महान् है, क्योंकि वह सबसे बड़ा है । अर्थात् अव्यक्त से जो सबसे पहले उत्पन्न हुआ हिरण्यगर्भ तत्त्व है, जो महान् आत्मा [ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति से सम्पन्न होने के कारण] बोधाबोधात्मक है वह बुद्धि से भी पर है—ऐसा कहा जाता है ॥ १० ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स्थूलानि तावदिन्द्रियाणि तानि यैरर्थैरात्मप्रकाशनाय आरब्धानि तेभ्य इन्द्रियेभ्यः स्वकार्येभ्यस्ते परा ह्यर्थाः सूक्ष्मा महान्तश्च प्रत्यगात्मभूताश्च ।

तेभ्योऽप्यर्थेभ्यश्च परं सूक्ष्मतरं महत्प्रत्यगात्मभूतं च मनः । मनःशब्दवाच्यं मनस आरम्भकं भूतसूक्ष्मं सङ्कल्पविकल्पाद्यारम्भकत्वात् । मनसोऽपि परा सूक्ष्मतरा महत्तरा प्रत्यगात्मभूता च बुद्धिः, बुद्धिशब्दवाच्यमध्यवसायाद्यारम्भकं भूतसूक्ष्मम् । बुद्धेरात्मा सर्वप्राणिबुद्धीनां प्रत्यगात्मभूतत्वादात्मा महान्सर्वमहत्त्वात् । अव्यक्ताद्यत्प्रथमं जातं हैरण्यगर्भं तत्त्वं बोधाबोधात्मकं महानात्मा बुद्धेः पर इत्युच्यते ॥ १० ॥