अध्याय 1 वल्ली 3 - मन्त्र 11

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥

mahataḥ paramavyaktamavyaktātpuruṣaḥ paraḥ .
puruṣānna paraṃ kiṃcitsā kāṣṭhā sā parā gatiḥ .. 11 ..


महत्तत्त्व से अव्यक्त (मूलप्रकृति) पर है और अव्यक्त से भी पुरुष पर है । पुरुष से पर और कुछ नहीं है । वही [सूक्ष्मत्व की] परा काष्ठा (हद) है, वही परा (उत्कृष्ट) गति है ॥ ११ ॥

महत् से भी पर—सूक्ष्मतर, प्रत्यगात्मस्वरूप और सबसे महान् अव्यक्त है, जो सम्पूर्ण जगत् का बीजभूत, अव्यक्त नाम-रूपों की सत्तास्वरूप, सम्पूर्ण कार्य-कारण-शक्ति का समाहार, अव्यक्त, अव्याकृत और आकाशादि नामों से निर्दिष्ट होनेवाला तथा वट के दाने में रहनेवाली वटवृक्ष की शक्ति के समान परमात्मा में ओत-प्रोतभाव से आश्रित है ।

उस अव्यक्त की अपेक्षा सम्पूर्ण कारणों का कारण तथा प्रत्यगात्मरूप होने से पुरुष पर—सूक्ष्मतर एवं महान् है । इसीलिये वह सब में पूरित रहने के कारण ‘पुरुष’ कहा जाता है । उसके सिवा किसी दूसरे उत्कृष्टतर के प्रसङ्ग का निवारण करते हुए कहते हैं कि पुरुष से पर और कुछ नहीं है । क्योंकि चिद्घनमात्र पुरुष से भिन्न और कोई वस्तु नहीं है इसलिये वही सूक्ष्मत्व, महत्त्व और प्रत्यगात्मत्व की पराकाष्ठा—स्थिति अर्थात् पर्यवसान है ।

इन्द्रियों से लेकर इस आत्मा में ही सूक्ष्मत्वादि की परिसमाप्ति होती है । अतः यही गमन करनेवाले अर्थात् सम्पूर्ण गतियोंवाले संसारियों की पर—उत्कृष्ट गति है, जैसा कि “जिसको प्राप्त होकर फिर नहीं लौटते” इस स्मृति से सिद्ध होता है ॥ ११ ॥

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महतोऽपि परं सूक्ष्मतरं प्रत्यगात्मभूतं सर्वमहत्तरं च अव्यक्तं सर्वस्य जगतो बीजभूतम् अव्याकृतनामरूपसतत्त्वं सर्वकार्यकारणशक्तिसमाहाररूपम् अव्यक्ताव्याकृताकाशादिनामवाच्यं परमात्मन्योतप्रोतभावेन समाश्रितं वटकणिकायामिव वटवृक्षशक्तिः ।

तस्मादव्यक्तात्परः सूक्ष्मतरः सर्वकारणकारणत्वात्प्रत्यगात्मत्वाच्च महांश्च अत एव पुरुषः सर्वपूरणात् । ततोऽन्यस्य परस्य प्रसङ्गं निवारयन्नाह पुरुषान्न परं किंचिदिति । यस्मान्नास्ति पुरुषात् चिन्मात्रघनात् परं किंचिदपि वस्त्वन्तरं तस्मात्सूक्ष्मत्वमहत्त्वप्रत्यगात्मत्वानां सा काष्ठा निष्ठा पर्यवसानम् ।

अत्र हीन्द्रियेभ्य आरभ्य सूक्ष्मत्वादिपरिसमाप्तिः । अत एव च गन्तॄणां सर्वगतिमतां संसारिणां परा प्रकृष्टा गतिः “यद्गत्वा न निवर्तन्ते” (गीता ८ । २१; १५ । ६) इति स्मृतेः ॥ ११ ॥


शङ्का—यदि [पुरुष के प्रति] गति है तो [वहाँ से] आगति (लौटना) भी होना चाहिये; फिर ‘जिसके पास से फिर जन्म नहीं लेता’ ऐसा क्यों कहा जाता है?

समाधान—यह दोष नहीं है, क्योंकि सबका प्रत्यगात्मा होने से आत्मा के ज्ञान को ही उपचार से गति कहा गया है । तथा इन्द्रिय, मन और बुद्धि से आत्मा का परत्व प्रदर्शित कर उसका प्रत्यगात्मत्व दिखलाया गया है, क्योंकि जो जानेवाला है वह अपने से पृथक् अनात्मभूत एवं अप्राप्त स्थान की ओर ही जाया करता है; इससे विपरीत अपनी ही ओर नहीं आताजाता । इस विषय में “संसार-मार्ग से पार होने की इच्छावाले पुरुष मार्गरहित होते हैं” इत्यादि श्रुति भी प्रमाण है । तथा आगे की श्रुति भी पुरुष का सबका ही प्रत्यगात्मा होना प्रदर्शित करती है—

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ननु गतिश्चेदागत्यापि भवितव्यम् । कथं यस्माद्भूयो न जायत इति?

नैष दोषः । सर्वस्य प्रत्यगात्मत्वादवगतिरेव रित्युपचर्यते । प्रत्यगात्मत्वं च दर्शितमिन्द्रियमनोबुद्धिपरत्वेन ।

यो हि गन्ता सोऽगतमप्रत्यग्रूपं गच्छत्यनात्मभूतं न विपर्ययेण । तथा च श्रुतिः—“अनध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः” इत्याद्या । तथा च दर्शयति प्रत्यगात्मत्वं सर्वस्य—