दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥
eṣa sarveṣu bhūteṣu gūḍhotmā na prakāśate .
dṛśyate tvagryayā buddhyā sūkṣmayā sūkṣmadarśibhiḥ .. 12 ..
यह पुरुष ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतों में गूढ यानी छिपा हुआ, दर्शन, श्रवण आदि कर्म करनेवाला तथा अविद्या यानी माया से आच्छादित है । अतः सबका अन्तरात्मस्वरूप होने के कारण आत्मा किसी के प्रति प्रकाशित नहीं होता । अहो! यह माया बड़ी ही गम्भीर, दुर्गम और विचित्र है, जिससे कि ये संसार के सभी जीव वस्तुतः परमार्थस्वरूप होने पर भी [शास्त्र और आचार्य द्वारा] वैसा बोध कराये जाने पर ‘मैं परमात्मा हूँ’ इस तत्त्व को ग्रहण नहीं करते; बल्कि जो देह और इन्द्रिय आदि संघात घटादि के समान अपने दृश्य हैं, उन्हें किसी के न कहने पर भी ‘मैं इसका पुत्र हूँ’ इत्यादि प्रकार से आत्मभाव से ग्रहण करते हैं । निश्चय, उस परमात्मा की ही माया से यह सारा जगत् अत्यन्त भ्रान्त हो रहा है । “योगमाया से आवृत हुआ मैं सबके प्रति प्रकाशित नहीं होता” ऐसी ही यह स्मृति भी है ।
शङ्का—किन्तु “उसे जानकर पुरुष शोक नहीं करता” “[वह गूढ आत्मा] प्रकाशित (ज्ञात) नहीं होता” यह तो विपरीत ही कहा गया है ।
समाधान—ऐसी बात नहीं है । आत्मा अशुद्धबुद्धिपुरुष के लिये अविज्ञेय है; इसीलिये यह कहा गया है कि ‘वह प्रकाशित नहीं होता’ । वह तो संस्कारयुक्त और तीक्ष्ण—जो किसी पैनी नोक के समान सूक्ष्म हो ऐसी एकाग्रता से युक्त और सूक्ष्म वस्तु के निरीक्षण में लगी हुई तीव्र बुद्धि से ही दिखलायी देता है । किन्हें दिखलायी देता है? [इसपर कहते हैं—] सूक्ष्मदर्शियों को । “इन्द्रियों से उनके विषय सूक्ष्म हैं” इत्यादि प्रकार से सूक्ष्मता की परम्परा का विचार करने से जिनका पर-सूक्ष्म वस्तु को देखने का स्वभाव पड़ गया है, वे सूक्ष्मदर्शी हैं; उन सूक्ष्मदर्शी पण्डितों को [वह दिखलायी देता है]-यह इसका भावार्थ है ॥ १२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
एष पुरुषः सर्वेषु ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु भूतेषु गूढः संवृतो दर्शनश्रवणादिकर्माविद्यामायाच्छन्नोऽत एवात्मा न प्रकाशत आत्मत्वेन कस्यचित् ।
अहो अतिगम्भीरा दुरवगाह्या विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः परमार्थसतत्त्वोऽप्येवं बोध्यमानोऽहं परमात्मेति न गृह्णात्यनात्मानं देहेन्द्रियादिसङ्घातमात्मनो दृश्यमानमपि घटादिवदात्मत्वेनाहममुष्य पुत्र इत्यनुच्यमानोऽपि गृह्णाति । नूनं परस्यैव मायया मोमुह्यमानः सर्वो लोको बम्भ्रमीति । तथा च स्मरणम्—‘नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः’ (गीता ७ । २५) इत्यादि ।
ननु विरुद्धमिदमुच्यते “मत्वा धीरो न शोचति” (क० उ० २ । १ । ४) “न प्रकाशते” (क० उ० १ । ३ । १२) इति च ।
नैतदेवम् । असंस्कृतबुद्धेरविज्ञेयत्वान्न प्रकाशत इत्युक्तम् ।
दृश्यते तु संस्कृतया अग्र्यया अग्रमिवाग्र्या तया, एकाग्रतयोपेतयेत्येतत्, सूक्ष्मया सूक्ष्मवस्तुनिरूपणपरया; कैः? सूक्ष्मदर्शिभिः “इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः” इत्यादिप्रकारेण सूक्ष्मतापारम्पर्यदर्शनेन परं सूक्ष्मं द्रष्टुं शीलं येषां ते सूक्ष्मदर्शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः पण्डितैरित्येतत् ॥ १२ ॥