अध्याय 1 वल्ली 3 - मन्त्र 12

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥

eṣa sarveṣu bhūteṣu gūḍhotmā na prakāśate .
dṛśyate tvagryayā buddhyā sūkṣmayā sūkṣmadarśibhiḥ .. 12 ..


सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता । यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषों द्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धि से ही देखा जाता है ॥ १२ ॥

यह पुरुष ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतों में गूढ यानी छिपा हुआ, दर्शन, श्रवण आदि कर्म करनेवाला तथा अविद्या यानी माया से आच्छादित है । अतः सबका अन्तरात्मस्वरूप होने के कारण आत्मा किसी के प्रति प्रकाशित नहीं होता । अहो! यह माया बड़ी ही गम्भीर, दुर्गम और विचित्र है, जिससे कि ये संसार के सभी जीव वस्तुतः परमार्थस्वरूप होने पर भी [शास्त्र और आचार्य द्वारा] वैसा बोध कराये जाने पर ‘मैं परमात्मा हूँ’ इस तत्त्व को ग्रहण नहीं करते; बल्कि जो देह और इन्द्रिय आदि संघात घटादि के समान अपने दृश्य हैं, उन्हें किसी के न कहने पर भी ‘मैं इसका पुत्र हूँ’ इत्यादि प्रकार से आत्मभाव से ग्रहण करते हैं । निश्चय, उस परमात्मा की ही माया से यह सारा जगत् अत्यन्त भ्रान्त हो रहा है । “योगमाया से आवृत हुआ मैं सबके प्रति प्रकाशित नहीं होता” ऐसी ही यह स्मृति भी है ।

शङ्का—किन्तु “उसे जानकर पुरुष शोक नहीं करता” “[वह गूढ आत्मा] प्रकाशित (ज्ञात) नहीं होता” यह तो विपरीत ही कहा गया है ।

समाधान—ऐसी बात नहीं है । आत्मा अशुद्धबुद्धिपुरुष के लिये अविज्ञेय है; इसीलिये यह कहा गया है कि ‘वह प्रकाशित नहीं होता’ । वह तो संस्कारयुक्त और तीक्ष्ण—जो किसी पैनी नोक के समान सूक्ष्म हो ऐसी एकाग्रता से युक्त और सूक्ष्म वस्तु के निरीक्षण में लगी हुई तीव्र बुद्धि से ही दिखलायी देता है । किन्हें दिखलायी देता है? [इसपर कहते हैं—] सूक्ष्मदर्शियों को । “इन्द्रियों से उनके विषय सूक्ष्म हैं” इत्यादि प्रकार से सूक्ष्मता की परम्परा का विचार करने से जिनका पर-सूक्ष्म वस्तु को देखने का स्वभाव पड़ गया है, वे सूक्ष्मदर्शी हैं; उन सूक्ष्मदर्शी पण्डितों को [वह दिखलायी देता है]-यह इसका भावार्थ है ॥ १२ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

एष पुरुषः सर्वेषु ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु भूतेषु गूढः संवृतो दर्शनश्रवणादिकर्माविद्यामायाच्छन्नोऽत एवात्मा न प्रकाशत आत्मत्वेन कस्यचित् ।

अहो अतिगम्भीरा दुरवगाह्या विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः परमार्थसतत्त्वोऽप्येवं बोध्यमानोऽहं परमात्मेति न गृह्णात्यनात्मानं देहेन्द्रियादिसङ्घातमात्मनो दृश्यमानमपि घटादिवदात्मत्वेनाहममुष्य पुत्र इत्यनुच्यमानोऽपि गृह्णाति । नूनं परस्यैव मायया मोमुह्यमानः सर्वो लोको बम्भ्रमीति । तथा च स्मरणम्—‘नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः’ (गीता ७ । २५) इत्यादि ।

ननु विरुद्धमिदमुच्यते “मत्वा धीरो न शोचति” (क० उ० २ । १ । ४) “न प्रकाशते” (क० उ० १ । ३ । १२) इति च ।

नैतदेवम् । असंस्कृतबुद्धेरविज्ञेयत्वान्न प्रकाशत इत्युक्तम् ।

दृश्यते तु संस्कृतया अग्र्यया अग्रमिवाग्र्या तया, एकाग्रतयोपेतयेत्येतत्, सूक्ष्मया सूक्ष्मवस्तुनिरूपणपरया; कैः? सूक्ष्मदर्शिभिः “इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः” इत्यादिप्रकारेण सूक्ष्मतापारम्पर्यदर्शनेन परं सूक्ष्मं द्रष्टुं शीलं येषां ते सूक्ष्मदर्शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः पण्डितैरित्येतत् ॥ १२ ॥


लयचिन्तन

अब उसकी प्राप्ति का उपाय बतलाते हैं-
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तत्प्रतिपत्त्युपायमाह-