अध्याय 1 वल्ली 3 - मन्त्र 13

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥

yacchedvāṅmanasī prājñastadyacchejjñāna ātmani .
jñānamātmani mahati niyacchettadyacchecchānta ātmani .. 13 ..


विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रिय का मन में उपसंहार करे, उसका प्रकाशस्वरूप बुद्धि में लय करे, बुद्धि को महत्तत्त्व में लीन करे और महत्तत्त्व को शान्त आत्मा में नियुक्त करे ॥ १३ ॥
विवेकी पुरुष ‘यच्छेत्’ अर्थात् नियुक्त करे-उपसंहार करे; किसका उपसंहार करे? वाक् अर्थात् वाणी का । यहाँ वाक् सम्पूर्ण इन्द्रियों का उपलक्षण कराने के लिये है । कहाँ उपसंहार करे? मन में; ‘मनसी’ पद में ह्रस्व इकार के स्थान में दीर्घ प्रयोग छान्दस है । फिर उस मन को ज्ञान अर्थात् प्रकाशस्वरूप बुद्धि-आत्मा में लीन करे । बुद्धि ही मन आदि इन्द्रियों में व्याप्त है, इसलिये वह उनका आत्मा-प्रत्यक्स्वरूप है । उस ज्ञानस्वरूप बुद्धि को प्रथम विकार महान् आत्मा में लीन करे अर्थात् प्रथम उत्पन्न हुए महत्तत्त्व के समान आत्मा का स्वच्छ-भाव विज्ञान प्राप्त करे । और महान् आत्मा को जिसका स्वरूप सम्पूर्ण विशेषों से रहित है और जो अविक्रिय, सर्वान्तर तथा बुद्धि के सम्पूर्ण प्रत्ययों का साक्षी है उस मुख्य आत्मा में लीन करे ॥ १३ ॥
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यच्छेन्नियच्छेदुपसंहरेत्प्राज्ञो विवेकी; किम्? वाग्वाचम् । वागत्रोपलक्षणार्था सर्वेषामिन्द्रियाणाम् । क्व? मनसी । मनसीतिच्छान्दसं दैर्घ्यम् । तच्च मनो यच्छेज्ज्ञाने प्रकाशस्वरूपे बुद्धौ आत्मनि । बुद्धिर्हि मन-आदिकरणान्याप्नोतीत्यात्मा प्रत्यक् तेषाम् । ज्ञानं बुद्धिमात्मनि महति प्रथमजे नियच्छेत् । प्रथमजवत् स्वच्छस्वभावकमात्मनो विज्ञानम् आपादयेदित्यर्थः । तं च महान्तम् आत्मानं यच्छेच्छान्ते सर्वविशेषप्रत्यस्तमितरूपेऽविक्रिये सर्वान्तरे सर्वबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणि मुख्य आत्मनि ॥ १३ ॥

मृगतृष्णा, रज्जु और आकाश के स्वरूप का ज्ञान होने से जैसे मृगजल, रज्जु-सर्प और आकाश-मालिन्य का बाध हो जाता है, उसी प्रकार मिथ्याज्ञान से प्रतीत होनेवाले समस्त प्रपञ्च यानी नाम, रूप और कर्म इन तीनों को, जो क्रिया, कारक और फलरूप ही हैं, स्वात्मतत्त्व के यथार्थ ज्ञानद्वारा पुरुष अर्थात् आत्मा में लीन करके मनुष्य स्वस्थ, प्रशान्तचित्त एवं कृतकृत्य हो जाता है । क्योंकि ऐसा है, इसलिये उसका साक्षात्कार करने के लिये-
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एवं पुरुष आत्मनि सर्वं प्रविलाप्य नामरूपकर्मत्रयं यन्मिथ्याज्ञानविजृम्भितं क्रियाकारकफललक्षणं स्वात्मयाथात्म्यज्ञानेन मरीच्युदकरज्जुसर्पगगनमलानीव मरीचिरज्जुगगनस्वरूपदर्शनेनैव स्वस्थः प्रशान्तात्मा कृतकृत्यो भवति यतोऽतस्तद्दर्शनार्थम्-