अध्याय 1 वल्ली 3 - मन्त्र 14

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥

uttiṣṭhata jāgrata prāpya varānnibodhata .
kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṃ pathastatkavayo vadanti .. 14 ..


[अरे अविद्याग्रस्त लोगो! ] उठो, [अज्ञान-निद्रा से] जागो, और श्रेष्ठ पुरुषों के समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करो । जिस प्रकार छुरे की धार तीक्ष्ण और दुस्तर होती है, तत्त्वज्ञानी लोग उस मार्ग को वैसा ही दुर्गम बतलाते हैं ॥ १४ ॥

अरे अनादि अविद्या से सोये हुए जीवो! उठो, आत्मज्ञान के अभिमुख होओ तथा घोररूप अज्ञाननिद्रा से जागो-सम्पूर्ण अनर्थों की बीजभूत उस अज्ञाननिद्रा का क्षय करो ।

किस प्रकार [क्षय करें]? श्रेष्ठ-उत्कृष्ट आत्मज्ञानी आचार्यों के पास जाकर-उनके समीप पहुँचकर उनके उपदेश किये हुए सर्वान्तर्यामी आत्मा को ‘मैं यही हूँ’ ऐसा जानो । उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये-ऐसा मातृवत् श्रुति कृपापूर्वक कह रही है, क्योंकि वह ज्ञेय पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म-बुद्धि का ही विषय है । सूक्ष्म-बुद्धि कैसी होती है?

इसपर कहते हैं-निशित अर्थात् पैनायी हुई छुरे की धार-अग्रभाग जिस प्रकार दुरत्यय होती है-जिसे कठिनता से पार किया जा सके उसे दुरत्यय कहते हैं । जिस प्रकार उसपर पैरों से चलना अत्यन्त कठिन है उसी प्रकार यह आत्मज्ञान का मार्ग बड़ा दुर्गम अर्थात् दुष्प्राप्य है-ऐसा कवि-मेधावी पुरुष कहते हैं । अभिप्राय यह है कि ज्ञेय अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण मनीषिजन उससे सम्बन्धित ज्ञानमार्ग को दुष्प्राप्य बतलाते हैं ॥ १४ ॥

उस ज्ञेय की अत्यन्त सूक्ष्मता किस प्रकार है? इसपर कहते हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-[इन पाँचों विषयों]-से वृद्धि को प्राप्त हुई तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों की विषयभूत यह पृथिवी स्थूल है; ऐसा ही शरीर भी है । उनमें गन्धादि गुणों में से एक-एक का अपकर्ष-क्षय होने से जल से लेकर आकाशपर्यन्त चार भूतों में सूक्ष्मत्व, महत्त्व, विशुद्धत्व और नित्यत्व आदि का तारतम्य देखा गया है । किन्तु स्थूल होने के कारण जहाँ गन्ध से लेकर शब्दपर्यन्त ये सारे विकार नहीं हैं उसके सूक्ष्मत्वादि की निरतिशयता के विषय में क्या कहा जाय? यही बात आगे की श्रुति दिखलाती है-

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अनाद्यविद्याप्रसुप्ता उत्तिष्ठत हे जन्तव आत्मज्ञानाभिमुखा भवत; जाग्रताज्ञाननिद्राया घोररूपायाः सर्वानर्थबीजभूतायाः क्षयं कुरुत ।

कथम्? प्राप्योपगम्य वरान् प्रकृष्टानाचार्यांस्तद्विदस्तदुपदिष्टं सर्वान्तरमात्मानमहमस्मीति निबोधतावगच्छत । न ह्युपेक्षितव्यमिति श्रुतिरनुकम्प्याह मातृवत् । अतिसूक्ष्मबुद्धिविषयत्वाज्ज्ञेयस्य ।

किमिव सूक्ष्मबुद्धिरित्युच्यते; क्षुरस्य धाराग्रं निशिता तीक्ष्णीकृता दुरत्यया दुःखेनात्ययो यस्याः सा दुरत्यया । यथा सा पद्भ्यां दुर्गमनीया तथा दुर्गं दुःसम्पाद्यमित्येतत् पथः पन्थानं तत्त्वज्ञानलक्षणं मार्गं कवयो मेधाविनो वदन्ति । ज्ञेयस्यातिसूक्ष्मत्वात्तद्विषयस्य ज्ञानमार्गस्य दुःसम्पाद्यत्वं वदन्तीत्यभिप्रायः ॥ १४ ॥

तत्कथमतिसूक्ष्मत्वं ज्ञेयस्य इत्युच्यते; स्थूला तावदियं मेदिनी शब्दस्पर्शरूपरसगन्धोपचिता सर्वेन्द्रियविषयभूता तथा शरीरम् । तत्रैकैकगुणापकर्षेण गन्धादीनां सूक्ष्मत्वमहत्त्वविशुद्धत्वनित्यत्वादितारतम्यं दृष्टमबादिषु यावदाकाशमिति ते गन्धादयः सर्व एव स्थूलत्वाद्विकाराः शब्दान्ता यत्र न सन्ति किमु तस्य सूक्ष्मत्वादिनिरतिशयत्वं वक्तव्यम् इत्येतद्दर्शयति श्रुतिः-