य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ॥
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ॥
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥
ya imaṃ paramaṃ guhyaṃ śrāvayed brahmasaṃsadi .
prayataḥ śrāddhakāle vā tadānantyāya kalpate ..
tadānantyāya kalpata iti .. 17 ..
जो पुरुष इस परमगुह्य ग्रन्थ को पवित्रतापूर्वक ब्राह्मणों की सभा में अथवा श्राद्धकाल में सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है, अनन्त फलवाला होता है ॥ १७ ॥
जो कोई पुरुष इस परम-प्रकृष्ट और गुह्य-गोपनीय ग्रन्थ को पवित्र होकर ब्राह्मणों की सभा में अथवा श्राद्धकाल में-भोजन करने के लिये बैठे हुए ब्राह्मणों के प्रति केवल पाठमात्र या अर्थ करते हुए सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है । यहाँ अध्याय की समाप्ति के लिये ‘तदानन्त्याय कल्पते’ यह वाक्य दो बार कहा गया है ॥ १७ ॥
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यः कश्चिदिमं ग्रन्थं परमं प्रकृष्टं गुह्यं गोप्यं श्रावयेद् ग्रन्थतोऽर्थतश्च ब्राह्मणानां संसदि ब्रह्मसंसदि प्रयतः शुचिर्भूत्वा श्राद्धकाले वा श्रावयेद् भुञ्जानानां तच्छ्राद्धमस्यानन्त्यायानन्तफलाय कल्पते सम्पद्यते । द्विर्वचनम् अध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १७ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये तृतीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ ३ ॥
इति कठोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
प्रथमा वल्ली
आत्मदर्शन का विघ्न-इन्द्रियों की बहिर्मुखता
‘सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ वह आत्मा प्रकाशित नहीं होता; वह तो एकाग्र बुद्धि से ही देखा जाता है’ ऐसा पहले (१ । ३ । १२ में) कहा था । अब प्रश्न होता है कि एकाग्र बुद्धि का ऐसा कौन प्रतिबन्ध है जिससे कि उस (एकाग्र बुद्धि)-का अभाव होने पर आत्मा दिखायी नहीं देता? अतः आत्मदर्शन के प्रतिबन्ध का कारण दिखलाने के लिये यह वल्ली आरम्भ की जाती है, क्योंकि श्रेय के प्रतिबन्ध का कारण जान लेने पर ही उसकी निवृत्ति के यत्न का आरम्भ किया जा सकता है, अन्यथा नहीं-
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एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्येत्युक्तम् । कः पुनः प्रतिबन्धोऽग्र्यया बुद्धेर्येन तदभावाद् आत्मा न दृश्यत इति तददर्शनकारणप्रदर्शनार्था वल्ल्यारभ्यते । विज्ञाते हि श्रेयःप्रतिबन्धकारणे तदपनयनाय यत्न आरब्धुं शक्यते नान्यथेति-