अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतग्ँशकेमहि ॥ २ ॥
yaḥ seturījānānāmakṣaraṃ brahma yatparam .
abhayaṃ titīrṣatāṃ pāraṃ nāciketag̐śakemahi .. 2 ..
दुःख को पार करने का साधन होने से जो नाचिकेत अग्नि यजमान अर्थात् कर्मियों के लिये सेतु के समान होने के कारण सेतु है उसे हम जानने और चयन करने में समर्थ हों । तथा जो भयरहित है और संसार के पार जाने की इच्छावाले ब्रह्मवेत्ताओं का परम आश्रय अविनाशी आत्मा नामक ब्रह्म है उसे भी हम जानने में समर्थ हो सकें । अर्थात् कर्मवेत्ता का आश्रय अपरब्रह्म और ब्रह्मवेत्ता का आश्रय परब्रह्म—ये दोनों ही ज्ञातव्य हैं—यह इस वाक्य का अर्थ है । ‘ऋतं पिबन्तौ’ इत्यादि मन्त्र से इन्हीं दोनों [ब्रह्मों] का उल्लेख किया गया है ॥ २ ॥
उनमें जो उपाधिपरिच्छिन्न संसारी तथा मोक्ष एवं संसार के प्रति गमन करने के लिये विद्या और अविद्या का अधिकारी है उसके लिये उन दोनों के प्रति जाने के साधनस्वरूप रथ की कल्पना की जाती है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यः सेतुरिव सेतुरीजानानां—यजमानानां कर्मिणां दुःखसंतरणार्थत्वान्नाचिकेतोऽग्निस्तं वयं ज्ञातुं चेतुं च शकेमहि शक्नुवन्तः । किं च यच्चाभयं भयशून्यं संसारपारं तितीर्षतां तर्तुमिच्छतां ब्रह्मविदां यत्परमाश्रयमक्षरमात्माख्यं ब्रह्म तच्च ज्ञातुं शकेमहि शक्नुवन्तः । परापरे ब्रह्मणी कर्मब्रह्मविदाश्रये वेदितव्ये इति वाक्यार्थः । एतयोरेव ह्युपन्यासः कृत ऋतं पिबन्ताविति ॥ २ ॥
तत्र य उपाधिकृतः संसारी विद्याविद्ययोरधिकृतो मोक्षगमनाय संसारगमनाय च तस्य तदुभयगमने साधनो रथः कल्प्यते—