आत्मानग्ँ रथिनं विद्धि शरीरग्ँ रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥
ātmānag̐ rathinaṃ viddhi śarīrag̐ rathameva tu .
buddhiṃ tu sārathiṃ viddhi manaḥ pragrahameva ca .. 3 ..
तू आत्मा को रथी जान, शरीर को रथ समझ, बुद्धि को सारथी जान और मन को लगाम समझ ॥ ३ ॥
उनमें उस आत्मा को—कर्मफल भोगनेवाले संसारी को रथी—रथ का स्वामी जान और शरीर को तो रथ ही समझ, क्योंकि शरीर रथ में बँधे हुए अश्वरूप इन्द्रियगण से खींचा जाता है । तथा निश्चय करना ही जिसका लक्षण है उस बुद्धि को सारथी जान, क्योंकि सारथिरूप नेता ही जिसमें प्रधान है उस रथ के समान शरीर बुद्धिरूप नेता की प्रधानतावाला है, क्योंकि देह के सभी कार्य प्रायः बुद्धि के ही कर्तव्य हैं । और संकल्पविकल्पादिरूप मन को प्रग्रह—लगाम समझ, क्योंकि जिस प्रकार घोड़े लगाम से नियन्त्रित होकर चलते हैं उसी प्रकार श्रोत्रादि इन्द्रियाँ मन से नियन्त्रित होकर ही अपने विषयों में प्रवृत्त होती हैं ॥ ३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
तत्र तमात्मानमृतपं संसारिणं रथिनं रथस्वामिनं विद्धि जानीहि । शरीरं रथमेव तु रथबद्धहयस्थानीयैरिन्द्रियैराकृष्यमाणत्वाच्छरीरस्य । बुद्धिं तु अध्यवसायलक्षणां सारथिं विद्धि बुद्धिनेतृप्रधानत्वाच्छरीरस्य सारथिनेतृप्रधान इव रथः । सर्वं हि देहगतं कार्यं बुद्धिकर्तव्यमेव प्रायेण । मनः संकल्पविकल्पादिलक्षणं प्रग्रहं रशनां विद्धि । मनसा हि प्रगृहीतानि श्रोत्रादीनि करणानि प्रवर्तन्ते रशनयेवाश्वाः ॥ ३ ॥