आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥
indriyāṇi hayānāhurviṣayāg̐steṣu gocarān .
ātmendriyamanoyuktaṃ bhoktetyāhurmanīṣiṇaḥ .. 4 ..
रथ की कल्पना करने में कुशल पुरुषों ने चक्षु आदि इन्द्रियों को घोड़े बतलाया है, क्योंकि [इन्द्रिय और घोड़ों की क्रमशः] शरीर और रथ को खींचने में समानता है । इस प्रकार उन इन्द्रियों को घोड़ेरूप से परिकल्पित किये जाने पर रूपादि विषयों को उनके मार्ग जानो तथा शरीर इन्द्रिय और मन के सहित अर्थात् उनसे युक्त आत्मा को मनीषी—विवेकी पुरुष ‘यह भोक्ता—संसारी है’ ऐसा बतलाते हैं ।
केवल (शुद्ध) आत्मा तो भोक्ता है नहीं; उसका भोक्तृत्व तो बुद्धि आदि उपाधि के कारण ही है । इसी प्रकार ‘ध्यान करता हुआ-सा, चेष्टा करता हुआ-सा’ इत्यादि एक दूसरी श्रुति भी केवल आत्मा का अभोक्तृत्व ही दिखलाती है । ऐसा होने पर ही आगे कही जानेवाली रथकल्पना से उस वैष्णवपद की आत्मभाव से प्रतिपत्ति (प्राप्ति) बन सकती है—और किसी प्रकार नहीं, क्योंकि स्वभाव कभी नहीं बदल सकता ॥ ४ ॥
तात्पर्य पढ़ें
इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि हयान् आहु रथकल्पनाकुशलाः शरीररथाकर्षणसामान्यात् । तेष्वेव इन्द्रियेषु हयत्वेन परिकल्पितेषु गोचरान्मार्गान्रूपादीन्विषयान् विद्धि । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तः शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितं संयुक्तमात्मानं भोक्तेति संसारीत्याहुर्मनीषिणो विवेकिनः ।
न हि केवलस्यात्मनो भोक्तृत्वमस्ति बुद्ध्याद्युपाधिकृतमेव तस्य भोक्तृत्वम् । तथा च श्रुत्यन्तरं केवलस्याभोक्तृत्वमेव दर्शयति—‘ध्यायतीव लेलायतीव’ (बृ० उ० ४ । ३ । ७) इत्यादि । एवं च सति वक्ष्यमाणा रथकल्पनया वैष्णवस्य पदस्यात्मतया प्रतिपत्तिरुपपद्यते नान्यथा स्वभावानतिक्रमात् ॥ ४ ॥