अध्याय 1 वल्ली 3 - मन्त्र 6

यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥

yastu vijñānavānbhavati yuktena manasā sadā .
tasyendriyāṇi vaśyāni sadaśvā iva sāratheḥ .. 6 ..


परन्तु जो [बुद्धिरूप सारथी] कुशल और सर्वदा समाहितचित्त रहता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इस प्रकार रहती हैं जैसे सारथी के अधीन अच्छे घोड़े ॥ ६ ॥
किन्तु जो [बुद्धिरूप सारथी] पूर्वोक्त सारथी से विपरीत विज्ञानवान् (कुशल)—मन को नियन्त्रित रखनेवाला अर्थात् संयतचित्त होता है उसकी अश्वस्थानीय इन्द्रियाँ प्रवृत्त और निवृत्त किये जाने में इस प्रकार समर्थ होती हैं जैसे सारथी के लिये अच्छे घोड़े ॥ ६ ॥
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यस्तु पुनः पूर्वोक्तविपरीत: सारथिर्भवति विज्ञानवान्प्रगृहीतमनाः समाहितचित्तः सदा तस्याश्वस्थानीयानीन्द्रियाणि प्रवर्तयितुं निवर्तयितुं वा शक्यानि वश्यानि दान्ताः सदश्वा इवेतरसारथेः ॥ ६ ॥

उस पूर्वोक्त अविज्ञानवान् बुद्धिरूप सारथीवाले रथी के लिये श्रुति यह फल बतलाती है—
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तस्य पूर्वोक्तस्याविज्ञानवतो बुद्धिसारथेरिदं फलमाह—