यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।
न स तत्पदमाप्नोति सग्ँसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥
न स तत्पदमाप्नोति सग्ँसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥
yastvavijñānavānbhavatyamanaskaḥ sadāśuciḥ .
na sa tatpadamāpnoti sag̐sāraṃ cādhigacchati .. 7 ..
किन्तु जो अविज्ञानवान्, अनिगृहीतचित्त और सदा अपवित्र रहनेवाला होता है वह उस पद को प्राप्त नहीं कर सकता, प्रत्युत संसार को ही प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
किन्तु जो अविज्ञानवान्, अमनस्क—असंयतचित्त और इसीलिये सदा अपवित्र रहनेवाला होता है उस सारथी के द्वारा वह [जीवरूप] रथी उस पूर्वोक्त अक्षर परम पद को प्राप्त नहीं कर सकता । वह कैवल्य को प्राप्त नहीं होता—केवल इतना ही नहीं, बल्कि जन्ममरणरूप संसार को भी प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यस्त्वविज्ञानवान्भवति अमनस्कोऽप्रगृहीतमनस्कः स तत एवाशुचिः सदैव, न स रथी तत्पूर्वोक्तमक्षरं यत्परं पदम् आप्नोति तेन सारथिना । न केवलं कैवल्यं नाप्नोति संसारं च जन्ममरणलक्षणमधिगच्छति ॥ ७ ॥