अध्याय 1 वल्ली 3 - मन्त्र 8

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥

yastu vijñānavānbhavati samanaskaḥ sadā śuciḥ .
sa tu tatpadamāpnoti yasmādbhūyo na jāyate .. 8 ..


किन्तु जो विज्ञानवान्, संयतचित्त और सदा पवित्र रहनेवाला होता है वह तो उस पद को प्राप्त कर लेता है जहाँ से वह फिर उत्पन्न नहीं होता ॥ ८ ॥
किन्तु जो दूसरा रथी अर्थात् विद्वान् विज्ञानवान्—कुशल सारथी से युक्त, समनस्क—युक्तचित्त और इसीलिये सदा पवित्र रहनेवाला होता है वह तो उसी पद को प्राप्त कर लेता है, जिस प्राप्त हुए पद से च्युत न होकर वह फिर संसार में उत्पन्न नहीं होता ॥ ८ ॥
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यस्तु द्वितीयो विज्ञानवान् विज्ञानवत्सारथ्युपेतो रथी विद्वान् इत्येतत्; युक्तमनाः समनस्कः स तत एव सदा शुचिः स तु तत्पदमाप्नोति, यस्मादाप्तात्पदाद् अप्रच्युतः स भूयः पुनर्न जायते संसारे ॥ ८ ॥

वह पद क्या है? इसपर कहते हैं—
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किं तत्पदमित्याह—