विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥
vijñānasārathiryastu manaḥpragrahavānnaraḥ .
so’dhvanaḥ pāramāpnoti tadviṣṇoḥ paramaṃ padam .. 9 ..
जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धि-सारथी से युक्त और मन को वश में रखनेवाला होता है वह संसारमार्ग से पार होकर उस विष्णु (व्यापक परमात्मा)-के परमपद को प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
जो पूर्वोक्त विद्वान् पुरुष विवेकयुक्त बुद्धि-सारथी से युक्त मनोनिग्रहवान् यानी निगृहीतचित्त—एकाग्र मनवाला होता हुआ पवित्र है वह संसारगति के पार को यानी अवश्य, प्राप्तव्य परमात्मा को प्राप्त कर लेता है; अर्थात् सम्पूर्ण संसारबन्धनों से मुक्त हो जाता है । उस विष्णु यानी वासुदेव नामक सर्वव्यापक परब्रह्म परमात्मा का जो परम—उत्कृष्ट पद—स्थान अर्थात् स्वरूप है उसे वह विद्वान् प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
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विज्ञानसारथिर्यस्तु यो विवेकबुद्धिसारथिः पूर्वोक्तो मनःप्रग्रहवान्प्रगृहीतमनाः समाहितचित्तः सञ्छुचिर्नरो विद्वान्सोऽध्वनः संसारगतेः पारं परमेव अधिगन्तव्यमित्येतदाप्नोति मुच्यते सर्वसंसारबन्धनैः ।
तद्विष्णोर्व्यापनशीलस्य ब्रह्मणः परमात्मनो वासुदेवाख्यस्य परमं प्रकृष्टं पदं स्थानं सतत्त्वमित्येतद्यदसौ आप्नोति विद्वान् ॥ ९ ॥
अब जो प्राप्तव्य परम पद है उसका स्थूल इन्द्रियों से आरम्भ करके सूक्ष्मत्व के तारतम्यक्रम से प्रत्यगात्मस्वरूप से ज्ञान प्राप्त करना चाहिये, इसीलिये आगे का कथन आरम्भ किया जाता है—
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अधुना यत्पदं गन्तव्यं तस्य इन्द्रियाणि स्थूलान्यारभ्य सूक्ष्मतारतम्यक्रमेण प्रत्यगात्मतया अधिगमः कर्तव्य इत्येवमर्थमिदम् आरभ्यते—