कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥
parāñci khāni vyatṛṇatsvayaṃbhūstasmātparāṅpaśyati nāntarātman .
kaściddhīraḥ pratyagātmānamaikṣadāvṛttacakṣuramṛtatvamicchan .. 1 ..
जो पराक् अर्थात् बाहर की ओर अञ्चन करती-गमन करती हैं उन्हें ‘पराञ्चि’ (बाहर जानेवाली) कहते हैं । ‘ख’ छिद्रों को कहते हैं, उनसे उपलक्षित श्रोत्रादि इन्द्रियाँ ‘खानि’[ * ] नाम से कही गयी हैं । वे बहिर्मुख होकर ही शब्दादि विषयों को प्रकाशित करने के लिये प्रवृत्त हुआ करती हैं । क्योंकि वे स्वभाव से ही ऐसी हैं इसलिये उन्हें हिंसित कर दिया है-उनका हनन कर दिया है । वह [हनन करनेवाला] कौन है? स्वयम्भू—परमेश्वर अर्थात् जो स्वतः ही सर्वदा स्वतन्त्र रहता है-परतन्त्र नहीं रहता । इसलिये वह उपलब्धा सर्वदा पराक् अर्थात् बहिःस्वरूप अनात्मभूत शब्दादि विषयों को ही देखता-उपलब्ध करता है, ‘नान्तरात्मन्’ अर्थात् अन्तरात्मा को नहीं ।
> [ * ]: नपुंसक ‘ख’ शब्द का प्रथमा-बहुवचन ।
यद्यपि लोक का ऐसा ही स्वभाव है तो भी कोई धीर—बुद्धिमान्—विवेकी पुरुष ही नदी को उसके प्रवाह के विपरीत दिशा में फेर देने के समान [इन्द्रियों को विषयों की ओर से हटाकर] उस अपने प्रत्यगात्मा को [देखता है] । जो प्रत्यक् (सम्पूर्ण विषयों को जाननेवाला) हो और आत्मा भी हो उसे प्रत्यगात्मा कहते हैं । लोक में आत्मा शब्द ‘प्रत्यक्’ के अर्थ में ही रूढ है, और किसी अर्थ में नहीं । व्युत्पत्तिपक्ष में भी ‘आत्मा’ शब्द की प्रवृत्ति उसी (प्रत्यक्-अर्थ ही) में है जैसा कि “क्योंकि यह सबको व्याप्त करता है, ग्रहण करता है और इस लोक में विषयों को भोगता है तथा इसका सर्वदा सद्भाव है इसलिये यह ‘आत्मा’ कहलाता है” इस प्रकार आत्मा शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में स्मृति है ।
उस प्रत्यगात्मा को अर्थात् अपने स्वरूप को ‘ऐक्षत्’-देखा यानी देखता है । वैदिक प्रयोग में काल का नियम न होने के कारण यहाँ वर्तमान काल के अर्थ में भूतकाल की क्रिया [ऐक्षत्] का प्रयोग हुआ है । वह किस प्रकार देखता है? इसपर कहते हैं-‘आवृत्तचक्षुः’ अर्थात् जिसने अपनी चक्षु और श्रोत्रादि इन्द्रियसमूह को सम्पूर्ण विषयों से व्यावृत्त कर लिया है-लौटा लिया है, वह इस प्रकार संस्कारयुक्त हुआ पुरुष ही उस प्रत्यगात्मा को देख पाता है । एक ही पुरुष के लिये बाह्य विषयों की आलोचना में तत्पर रहना तथा प्रत्यगात्मा का साक्षात्कार करना—ये दोनों बातें सम्भव नहीं हैं । ‘अच्छा तो, इस प्रकार महान् परिश्रम से [इन्द्रियों की] स्वाभाविक प्रवृत्ति को रोककर धीर पुरुष प्रत्यगात्मा को क्यों देखता है? ’ ऐसी आशंका होने पर कहते हैं-‘अमृतत्व-अमरणधर्मत्व अर्थात् आत्मा की नित्यस्वभावता की इच्छा करता हुआ [उसे देखता है]’ ॥ १ ॥
तात्पर्य पढ़ें
पराञ्चि परागञ्चन्ति गच्छन्तीति खानि तदुपलक्षितानि श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि खानीत्युच्यन्ते । तानि पराञ्च्येव शब्दादिविषयप्रकाशनाय प्रवर्तन्ते । यस्मादेवं स्वाभाविकानि तानि व्यतृणद्धिंसितवान्हननं कृतवान् इत्यर्थः । कोऽसौ? स्वयंभूः परमेश्वरः स्वयमेव स्वतन्त्रो भवति सर्वदा न परतन्त्र इति । तस्मात्पराङ् पराग्रूपाननात्मभूताञ्शब्दादीन्पश्यत्युपलभत उपलब्धा, नान्तरात्मन्नन्तरात्मानमित्यर्थः ।
एवं स्वभावेऽपि सति लोकस्य कश्चिन्नद्याः प्रतिस्रोतःप्रवर्तनमिव धीरो धीमान्विवेकी प्रत्यगात्मानं प्रत्यक्चासावात्मा चेति प्रत्यगात्मा । प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढो लोके नान्यस्मिन् । व्युत्पत्तिपक्षेऽपि तत्रैवात्मशब्दो वर्तते । ‘यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । यच्चास्य संततो भावस्तस्मादात्मेति कीर्त्यते’ ॥ (लिङ्ग० १ । ७० । ९६) इत्यात्माशब्दव्युत्पत्तिस्मरणात् ।
तं प्रत्यगात्मानं स्वभावमैक्षदपश्यत्पश्यतीत्यर्थः, छन्दसि कालानियमात् । कथं पश्यतीत्युच्यते । आवृत्तचक्षुरावृत्तं व्यावृत्तं चक्षुः श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातम् अशेषविषयाद्यस्य स आवृत्तचक्षुः । स एवं संस्कृतः प्रत्यगात्मानं पश्यति । न हि बाह्यविषयालोचनपरत्वं प्रत्यगात्मेक्षणं चैकस्य सम्भवति । किमर्थं पुनरित्थं महता प्रयासेन स्वभावप्रवृत्तिनिरोधं कृत्वा धीरः प्रत्यगात्मानं पश्यति इत्युच्यते; अमृतत्वममरणधर्मत्वं नित्यस्वभावतामिच्छन् आत्मन इत्यर्थः ॥ १ ॥