मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन ।
मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥
मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥
manasaivedamāptavyaṃ neha nānāsti kiṃcana .
mṛtyoḥ sa mṛtyuṃ gacchati ya iha nāneva paśyati .. 11 ..
मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है । इस ब्रह्मतत्त्वमें नाना कुछ भी नहीं है । जो पुरुष इसमें नानात्व-सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको जाता है ॥ ११ ॥
मनके द्वारा ही यह एकरस ब्रह्म ‘सब कुछ आत्मा ही है और कुछ नहीं है’ इस प्रकार प्राप्त करने योग्य है । इस प्रकार उसकी प्राप्ति हो जानेपर नानात्वको स्थापित करनेवाली अविद्याके निवृत्त हो जानेसे इस ब्रह्मतत्त्वमें किञ्चित्—अणुमात्र भी नानात्व नहीं रहता । किन्तु जो पुरुष अविद्यारूप तिमिररोगग्रस्त दृष्टिको नहीं त्यागता बल्कि नानात्व ही देखता है वह इस प्रकार थोड़ा-सा भी भेद आरोपित करनेसे मृत्युसे मृत्युको [अर्थात् जन्म-मरणको] प्राप्त होता ही है ॥ ११ ॥
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मनसेदं ब्रह्मैकरसमाप्तव्यम् । आत्मैव नान्यदस्तीति । आप्ते च नानात्वप्रत्युपस्थापिकाया अविद्याया निवृत्तत्वादिह ब्रह्मणि नाना नास्ति किंचनाणुमात्रम् अपि । यस्तु पुनरविद्यातिमिरदृष्टिं न मुञ्चति नानेव पश्यति स मृत्योर्मृत्युं गच्छत्येव स्वल्पमपि भेदमध्यारोपयन् इत्यर्थः ॥ ११ ॥
हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म
फिर भी उस प्रकृत ब्रह्मका ही वर्णन करते हैं—
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पुनरपि तदेव प्रकृतं ब्रह्माह—