अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥
एतद्वै तत् ॥ १३ ॥
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥
एतद्वै तत् ॥ १३ ॥
aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo jyotirivādhūmakaḥ .
īśāno bhūtabhavyasya sa evādya sa u śvaḥ ..
etadvai tat .. 13 ..
यह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है । यह भूत-भविष्यत्का शासक है । यही आज (वर्तमान कालमें) है और यही कल (भविष्यमें) भी रहेगा । और निश्चय यही वह (ब्रह्मतत्त्व) है ॥ १३ ॥
वह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है । मूल मन्त्रमें जो ‘अधूमकः’ पद है वह [नपुंसकलिङ्ग] ‘ज्योतिः’ शब्दका विशेषण होनेके कारण ‘अधूमकम्’ ऐसा होना चाहिये । जो योगियोंको इस प्रकार हृदयमें लक्षित होता है वह भूत और भविष्यत्का शास्ता नित्य कूटस्थ आज—इस समय प्राणियोंमें वर्तमान है और वही कल भी रहेगा, अर्थात् उसके समान कोई और पुरुष उत्पन्न नहीं होगा । इससे ‘कोई कहते हैं कि यह नहीं है’ ऐसा [१ । १ । २० मन्त्रमें कहा हुआ] जो पक्ष है वह यद्यपि न्यायतः प्राप्त नहीं होता तथापि उसका और बौद्धोंके क्षणभङ्गवादका खण्डन भी श्रुतिने स्ववचनसे कर दिया है ॥ १३ ॥
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अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकोऽधूमकमिति युक्तं ज्योतिष्परत्वात् । यस्त्वेवं लक्षितो योगिभिर्हृदय ईशानो भूतभव्यस्य स नित्यः कूटस्थोऽद्येदानीं प्राणिषु वर्तमानः स उ श्वोऽपि वर्तिष्यते नान्यस्तत्समोऽन्यश्च जनिष्यत इत्यर्थः । अनेन नायमस्तीति चैक इत्ययं पक्षो न्यायतोऽप्राप्तोऽपि स्ववचनेन श्रुत्या प्रत्युक्तस्तथा क्षणभङ्गवादश्च ॥ १३ ॥
भेदापवाद
ब्रह्ममें जो भेददृष्टि की जाती है उसका अपवाद श्रुति फिर भी कहती है—
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पुनरपि भेददर्शनापवादं ब्रह्मण आह—