अध्याय 2 वल्ली 1 - मन्त्र 3

येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान् ।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते ।
एतद्वै तत् ॥ ३ ॥

yena rūpaṃ rasaṃ gandhaṃ śabdānsparśā~śca maithunān .
etenaiva vijānāti kimatra pariśiṣyate .
etadvai tat .. 3 ..


जिस इस आत्मा के द्वारा मनुष्य रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुनजन्य सुखों को निश्चयपूर्वक जानता है [उस आत्मा से अविज्ञेय] इस लोक में और क्या रह जाता है? [तुझ नचिकेता का पूछा हुआ] वह तत्त्व निश्चय यही है ॥ ३ ॥

शङ्का-परन्तु लोक में ऐसी कोई प्रसिद्धि नहीं है कि मैं किसी देहादि से विलक्षण आत्माद्वारा जानता हूँ । सब लोग यही समझते हैं कि मैं देहादि संघातरूप ही सब कुछ जानता हूँ ।

समाधान-ऐसी बात तो नहीं है, क्योंकि देहादि संघात भी समानरूप से शब्दादिरूप तथा विज्ञेयस्वरूप है; अतः उसे ज्ञाता मानना उचित नहीं है । यदि देहादि संघात रूप-रसादिस्वरूप होकर भी रूपादि को जान ले तो बाह्य रूपादि भी परस्पर एक-दूसरे को तथा अपने-अपने रूप को जान लेंगे; किन्तु यह बात है नहीं । अतः लोक देहादिस्वरूप रूपादि को इस देहादिव्यतिरिक्त विज्ञानस्वभाव आत्मा के द्वारा ही जानता है ।

जिस प्रकार लोहा जिसके द्वारा जलता है उसे अग्नि कहते हैं उसी प्रकार [जिसके द्वारा लोक देहादि विषयों को जानता है उसे आत्मा कहते हैं] ।

उस आत्मा से जिसका ज्ञान न हो सके ऐसा क्या पदार्थ इस लोक में रह जाता है, अर्थात् कुछ भी नहीं रहता-सभी कुछ आत्मा से ही जाना जा सकता है । [इस प्रकार] जिस आत्मा से अविज्ञेय कोई भी वस्तु नहीं रहती वह आत्मा सर्वज्ञ है और यही वह है । वह कौन है? जिसके विषय में तुझ नचिकेता ने प्रश्न किया है, जो देवादि का भी सन्देहास्पद है तथा जो धर्माधर्मादि से अन्य विष्णु का परम पद है और जिससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है वही यह [ब्रह्मपद] अब ज्ञात हुआ है-ऐसा इसका भावार्थ है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ननु नैवं प्रसिद्धिर्लोकस्य आत्मना देहादिविलक्षणेनाहं विजानामीति । देहादिसंघातोऽहं विजानामीति तु सर्वो लोकोऽवगच्छति ।

न त्वेवम् । देहादिसंघातस्यापि शब्दादिस्वरूपत्वाविशेषाद्विज्ञेयत्वाविशेषाच्च न युक्तं विज्ञातृत्वम् । यदि हि देहादिसंघातो रूपाद्यात्मकः सन् रूपादीन्विजानीयाद्बाह्या अपि रूपादयोऽन्योन्यं स्वं स्वं रूपं च विजानीयुः । न चैतदस्ति । तस्माद्देहादिलक्षणांश्च रूपादीनेतेनैव देहादिव्यतिरिक्तेनैव विज्ञानस्वभावेनात्मना विजानाति लोकः ।

यथा येन लोहो दहति सोऽग्निरिति तद्वत् ।

आत्मनोऽविज्ञेयं किमत्रास्मिँल्लोके परिशिष्यते न किंचित्परिशिष्यते । सर्वमेव त्वात्मना विज्ञेयम् । यस्यात्मनोऽविज्ञेयं न किंचित्परिशिष्यते स आत्मा सर्वज्ञः । एतद्वै तत् । किं तद्यद् नचिकेतसा पृष्टं देवादिभिरपि विचिकित्सितं धर्मादिभ्योऽन्यद् विष्णोः परमं पदं यस्मात्परं नास्ति तद्वा एतदधिगतमित्यर्थः ॥ ३ ॥


वह ब्रह्म अति सूक्ष्म होने के कारण दुर्विज्ञेय है-ऐसा मानकर उसी बात को बारम्बार कहते हैं-
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अतिसूक्ष्मत्वाद्दुर्विज्ञेयमिति मत्वैतमेवार्थं पुनः पुनराह-