स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥
svapnāntaṃ jāgaritāntaṃ cobhau yenānupaśyati .
mahāntaṃ vibhumātmānaṃ matvā dhīro na śocati .. 4 ..
जिसके द्वारा मनुष्य स्वप्न में प्रतीत होनेवाले तथा जाग्रत् में दिखायी देनेवाले-दोनों प्रकार के पदार्थों को देखता है उस महान् और विभु आत्मा को जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥
स्वप्नान्त-स्वप्न का मध्य अर्थात् स्वप्नावस्था में जाननेयोग्य तथा जागरितान्त-जाग्रत्-अवस्था का मध्य यानी जाग्रत्-अवस्था में जाननेयोग्य-इन दोनों स्वप्न और जाग्रत् के अन्तर्गत पदार्थों को लोक जिस आत्मा के द्वारा देखता है [वही ब्रह्म है; इस प्रकार] इस वाक्य की और सब व्याख्या पूर्व मन्त्र के समान करनी चाहिये । उस महान् और विभु आत्मा को जानकर अर्थात् ‘वह परमात्मा मैं ही हूँ’ ऐसा आत्मभाव से साक्षात् अनुभव कर धीर-बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥
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स्वप्नान्तं स्वप्नमध्यं स्वप्नविज्ञेयमित्यर्थस्तथा जागरितान्तं जागरितमध्यं जागरितविज्ञेयं च; उभौ स्वप्नजागरितान्तौ येन आत्मनानुपश्यति लोक इति सर्वं पूर्ववत् । तं महान्तं विभुमात्मानं मत्वावगम्यात्मभावेन साक्षाद् अहमस्मि परमात्मेति धीरो न शोचति ॥ ४ ॥
तथा-
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किं च-