अध्याय 2 वल्ली 1 - मन्त्र 5

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ।
एतद्वै तत् ॥ ५ ॥

ya imaṃ madhvadaṃ veda ātmānaṃ jīvamantikāt .
īśānaṃ bhūtabhavyasya na tato vijugupsate .
etadvai tat .. 5 ..


जो पुरुष इस कर्मफलभोक्ता और प्राणादि को धारण करनेवाले आत्मा को उसके समीप रहकर भूत, भविष्यत् [और वर्तमान] के शासकरूप से जानता है वह वैसा विज्ञान हो जाने के अनन्तर उस (आत्मा) की रक्षा करने की इच्छा नहीं करता । निश्चय यही वह [आत्मतत्त्व] है ॥ ५ ॥
जो कोई इस मध्वद-कर्मफलभोक्ता और जीव-प्राणादि करणकलाप को धारण करनेवाले आत्मा को समीप से भूत-भविष्यत् आदि तीनों कालों के शासकरूप से जानता है, वह ऐसा ज्ञान हो जाने के अनन्तर उस आत्माका गोपन—रक्षण नहीं करना चाहता, क्योंकि वह अभयको प्राप्त हो जाता है । जबतक वह भयके मध्यमें स्थित हुआ अपने आत्माको अनित्य समझता है तभीतक उसकी रक्षा भी करना चाहता है । जिस समय आत्माको नित्य और अद्वैत जान लेता है उस समय कौन किसको कहाँसे सुरक्षित रखनेकी इच्छा करेगा? निश्चय यही वह आत्मतत्त्व है—इस प्रकार पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ ५ ॥
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यः कश्चिदिमं मध्वदं कर्मफलभुजं जीवं प्राणादिकलापस्य धारयितारमात्मानं वेद विजानाति अन्तिकादन्तिके समीप ईशानम् ईशितारं भूतभव्यस्य कालत्रयस्य, ततस्तद्विज्ञानादूर्ध्वमात्मानं न विजुगुप्सते न गोपायितुम् इच्छत्यभयप्राप्तत्वात् । यावद्धि भयमध्यस्थोऽनित्यमात्मानं मन्यते तावद्गोपायितुमिच्छत्यात्मानम् । यदा तु नित्यमद्वैतमात्मानं विजानाति तदा किं कः कुतो वा गोपायितुमिच्छेत् । एतद्वै तदिति पूर्ववत् ॥ ५ ॥

जिस प्रत्यगात्माका यहाँ ईश्वरभावसे निर्देश किया गया है वह सबका अन्तरात्मा है—यह बात इस मन्त्रसे दिखलायी जाती है—
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यः प्रत्यगात्मेश्वरभावेन निर्दिष्टः स सर्वात्मेत्येतद्दर्शयति—