अध्याय 2 वल्ली 1 - मन्त्र 7

या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत ॥
एतद्वै तत् ॥ ७ ॥

yā prāṇena saṃbhavatyaditirdevatāmayī .
guhāṃ praviśya tiṣṭhantīṃ yā bhūtebhirvyajāyata ..
etadvai tat .. 7 ..


जो देवतामयी अदिति प्राणरूपसे प्रकट होती है तथा जो बुद्धिरूप गुहामें प्रविष्ट होकर रहनेवाली और भूतोंके साथ ही उत्पन्न हुई है [उसे देखो] निश्चय यही वह तत्त्व है ॥ ७ ॥
जो सर्वदेवतामयी—सर्वदेवस्वरूपा अदिति प्राण अर्थात् हिरण्यगर्भरूपसे परब्रह्मसे उत्पन्न होती है; शब्दादि विषयोंका अदन (भक्षण) करनेके कारण उसे अदिति कहते हैं—बुद्धिरूप गुहामें पूर्ववत् प्रविष्ट होकर स्थित हुई उस अदितिको [देखो] । उस अदितिकी ही विशेषता बतलाते हैं—जो भूतोंके सहित अर्थात् भूतोंसे समन्वित ही उत्पन्न हुई है । [वही तेरा पूछा हुआ तत्त्व है] ॥ ७ ॥
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या सर्वदेवतामयी सर्वदेवतात्मिका प्राणेन हिरण्यगर्भरूपेण परस्माद् ब्रह्मणः संभवति शब्दादीनामदनाददितिस्तां पूर्ववद् गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीमदितिम् । तामेव विशिनष्टि—या भूतेभिः भूतैः समन्विता व्यजायत उत्पन्ना इत्येतत् ॥ ७ ॥

अरणिस्थ अग्निमें ब्रह्मदृष्टि

तथा—
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किं च—