अध्याय 2 वल्ली 1 - मन्त्र 9

यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन ॥
एतद्वै तत् ॥ ९ ॥

yataścodeti sūryo’staṃ yatra ca gacchati .
taṃ devāḥ sarve arpitāstadu nātyeti kaścana ..
etadvai tat .. 9 ..


जहाँसे सूर्य उदित होता है और जहाँ वह अस्त हो जाता है उस प्राणात्मामें [अन्नादि और वागादिक] सम्पूर्ण देवता अर्पित हैं । उसका कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता । यही वह ब्रह्म है ॥ ९ ॥
जिससे—जिस प्राणसे नित्यप्रति सूर्य उदित होता है और जिस प्राणमें ही वह नित्यप्रति अस्त भावको प्राप्त होता है उस प्राणात्मामें स्थितिके समय अग्नि आदि अधिदैव और वागादि अध्यात्म सभी देवता इस प्रकार अर्पित हैं—प्रविष्ट किये गये हैं जैसे रथकी नाभिमें समस्त अरे; वह [प्राण] भी ब्रह्म ही है । वही यह सर्वात्मक ब्रह्म है । उसका अतिक्रमण कोई भी नहीं करता अर्थात् उस ब्रह्मके तादात्म्य भावको पार करके कोई भी उससे अन्यत्वको प्राप्त नहीं होता । यही वह (ब्रह्म) है ॥ ९ ॥
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यतश्च यस्मात्प्राणादुदेति उत्तिष्ठति सूर्योऽस्तं निम्लोचनं यत्र यस्मिन्नेव च प्राणेऽहन्यह निगच्छति तं प्राणमात्मानं देवा अग्न्यादयोऽधिदैवं वागादयश्च अध्यात्मं सर्वे विश्वेऽरा इव रथनाभावर्पिताः सम्प्रवेशिताः स्थितिकाले सोऽपि ब्रह्मैव । तदेतत् सर्वात्मकं ब्रह्म । तदु नात्येति नातीत्य तदात्मकतां तदन्यत्वं गच्छति कश्चन कश्चिदपि । एतद्वै तत् ॥ ९ ॥

जो ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंमें वर्तमान है और भिन्न-भिन्न उपाधियोंके कारण अब्रह्मवत् भासित होता है वह संसारी जीव परब्रह्मसे भिन्न है—ऐसी किसीको शङ्का न हो जाय, इसलिये यमराज इस प्रकार कहते हैं—
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यद्ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु वर्तमानं तत्तदुपाधित्वादब्रह्मवदवभासमानं संसार्यन्यत्परस्माद् ब्रह्मण इति मा भूत्कस्यचिदाशङ्का इतीदमाह—