अध्याय 2 वल्ली 2 - मन्त्र 2

हँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥

ha~saḥ śuciṣadvasurantarikṣasaddhotā vediṣadatithirduroṇasat .
nṛṣadvarasadṛtasadvyomasadabjā gojā ṛtajā adrijā ṛtaṃ bṛhat .. 2 ..


वह गमन करनेवाला है, आकाशमें चलनेवाला सूर्य है, वसु है, अन्तरिक्षमें विचरनेवाला सर्वव्यापक वायु है, वेदी (पृथिवी)-में स्थित होता (अग्नि) है, कलशमें स्थित सोम है । इसी प्रकार वह मनुष्योंमें गमन करनेवाला, देवताओंमें जानेवाला, सत्य या यज्ञमें गमन करनेवाला, आकाशमें जानेवाला, जल, पृथिवी, यज्ञ और पर्वतोंसे उत्पन्न होनेवाला तथा सत्यस्वरूप और महान् है ॥ २ ॥

वह गमन करता है इसलिये ‘हंस’ है, शुचि—आकाशमें सूर्यरूपसे चलता है इसलिये ‘शुचिषत्’ है, सबको वास कराता है इसलिये ‘वसु’ है, वायुरूपसे आकाशमें चलता है इसलिये ‘अन्तरिक्षसत्’ है, “अग्नि ही होता है” इस श्रुतिके अनुसार ‘होता’ अग्निको कहते हैं, वेदी—पृथिवीमें गमन करता है अतः ‘वेदिषद्’ है, जैसा कि “यह वेदी पृथिवी (यज्ञभूमि)-का उत्कृष्ट मध्यभाग है” इत्यादि मन्त्रवर्णसे प्रमाणित होता है । यह अतिथि—सोम होकर दुरोण— कलशमें स्थित होता है इसलिये ‘दुरोणसत्’ है । अथवा ब्राह्मण अतिथि-रूपसे दुरोण—घरोंमें रहता है, इसलिये वही ‘अतिथिः दुरोणसत्’ है ।

वह मनुष्योंमें जाता है इसलिये ‘नृषत्’ है, वर—देवताओंमें जाता है इसलिये ‘वरसत्’ है, ऋत—सत्य अथवा यज्ञको कहते हैं उसमें गमन करता है इसलिये ‘ऋतसत्’ है, व्योम—आकाशमें चलता है इसलिये ‘व्योमसत्’ है । अप्—जलमें शंख, सीपी और मकर आदि रूपोंसे उत्पन्न होता है इसलिये ‘अब्जा’ है । गो— पृथिवीमें व्रीहि—यवादिरूपसे उत्पन्न होता है इसलिये ‘गोजा’ है । ऋत—यज्ञाङ्गरूपसे उत्पन्न होता है इसलिये ‘ऋतजा’ है । नदी आदिरूपसे अद्रि— पर्वतोंसे उत्पन्न होता है इसलिये ‘अद्रिजा’ है ।

इस प्रकार सर्वात्मा होकर भी वह ऋत— अवितथस्वभाव (सत्य-स्वरूप) ही है तथा सबका कारण होनेसे बृहत्— महान् है । [‘असौ वा आदित्यो हंसः…’ इत्यादि ब्राह्मणमन्त्रके अनुसार] यदि इस मन्त्रसे आदित्यका ही वर्णन किया गया हो तो भी ‘आदित्य[ * ] [इस चराचरके] आत्मस्वरूप है’, ऐसा अङ्गीकृत होनेके कारण इसका उस ब्राह्मणग्रन्थकी व्याख्यासे भी अविरोध ही है । अतः इस मन्त्रका तात्पर्य यही है कि जगत्का एक ही सर्वव्यापक आत्मा है, आत्माओंमें भेद नहीं है ॥ २ ॥

तात्पर्य पढ़ें

हंसो हन्ति गच्छतीति । शुचिषच्छुचौ दिव्या दित्यात्मना सीदति इति । वसुर्वासयति सर्वानिति । वाय्वात्मनान्तरिक्षे सीदतीत्यन्तरिक्षसत् । होताग्निः ‘अग्निर्वै होता’ इति श्रुतेः । वेद्यां पृथिव्यां सीदतीति वेदिषद् । ‘इयं वेदिः परोऽन्तः पृथिव्याः’ (ऋ० सं० २ । ३ । २०) इत्यादिमन्त्रवर्णात् । अतिथिः सोमः सन्दुरोणे कलशे सीदति इति दुरोणसत् । ब्राह्मणोऽतिथिरूपेण वा दुरोणेषु गृहेषु सीदतीति ।

नृषन्नृषु मनुष्येषु सीदतीति नृषत् । वरसद् वरेषु देवेषु सीदतीति ऋतसद्दृतं सत्यं यज्ञो वा तस्मिन्सीदतीति । व्योमसद् व्योम्याकाशे सीदतीति व्योमसत् । अब्जा अप्सु शङ्खशुक्तिमकरादिरूपेण जायत इति । गोजा गवि पृथिव्यां व्रीहियवादिरूपेण जायत इति । ऋतजा यज्ञाङ्गरूपेण जायत इति । अद्रिजाः पर्वतेभ्यो नद्यादिरूपेण जायत इति ।

सर्वात्मापि सन्नृतमवितथस्वभाव एव । बृहन्महान्सर्वकारणत्वात् । यदाप्यादित्य एव मन्त्रेणोच्यते तदाप्यस्यात्मस्वरूपत्वमादित्यस्येत्यङ्गीकृतत्वाद् ब्राह्मणव्याख्यानेऽप्यविरोधः । सर्वव्याप्येक एवात्मा जगतो नात्मभेद इति मन्त्रार्थः ॥ २ ॥


अब आत्माका स्वरूपज्ञान करानेमें लिङ्ग बतलाते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
आत्मनः स्वरूपाधिगमे लिङ्गमुच्यते—