ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥
ūrdhvaṃ prāṇamunnayatyapānaṃ pratyagasyati .
madhye vāmanamāsīnaṃ viśve devā upāsate .. 3 ..
जो प्राणको ऊपरकी ओर ले जाता है और अपानको नीचेकी ओर ढकेलता है, हृदयके मध्यमें रहनेवाले उस वामन—भजनीयकी सब देव उपासना करते हैं ॥ ३ ॥
जो हृदयदेशसे प्राण—प्राणवृत्तिरूप वायुको ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर ले जाता है तथा अपानको प्रत्यक्—नीचेकी ओर ढकेलता है । इस वाक्यमें ‘यः (जो)’ यह पद शेष रह गया है, हृदयकमलाकाशके भीतर रहनेवाले उस वामन अर्थात् भजनीयकी, जिसका विज्ञानरूप प्रकाश बुद्धिमें अभिव्यक्त होता है, चक्षु आदि सभी देव—इन्द्रियाँ और प्राण रूप-रसादि विज्ञानरूप कर देते हुए इस प्रकार उपासना करते हैं जैसे वैश्यलोग राजा की । अर्थात् वे चक्षु आदि उसके ही लिये अपना व्यापार बन्द नहीं करते । अतः जिसके लिये और जिसकी प्रेरणा से प्राण और इन्द्रियों के समस्त व्यापार होते हैं वह उनसे अन्य है—ऐसा सिद्ध हुआ । यही इस वाक्य का अर्थ है ॥ ३ ॥
> [ * ]: सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (ऋ० सं० १ । ८ । ७) ।
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ऊर्ध्वं हृदयात्प्राणं प्राणवृत्तिं वायुमुन्नयत्यूर्ध्वं गमयति । तथापानं प्रत्यगधोऽस्यति क्षिपति य इति वाक्यशेषः । तं मध्ये हृदयपुण्डरीकाकाश आसीनंबुद्धावभिव्यक्तविज्ञानप्रकाशनं वामनं संभजनीयं सर्वे विश्वे देवाश्चक्षुरादयः प्राणा रूपादिविज्ञानं बलिमुपहरन्तो विश इव राजानमुपासते । तादर्थ्येनानुपरतव्यापारा भवन्ति इत्यर्थः । यदर्था यत्प्रयुक्ताश्च सर्वे वायुकरणव्यापाराः सोऽन्यः सिद्ध इति वाक्यार्थः ॥ ३ ॥
देहस्थ आत्मा ही जीवन है
तथा—
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किं च