अध्याय 2 वल्ली 2 - मन्त्र 4

अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥
एतद्वै तत् ॥ ४ ॥

asya visraṃsamānasya śarīrasthasya dehinaḥ .
dehādvimucyamānasya kimatra pariśiṣyate ..
etadvai tat .. 4 ..


इस शरीरस्थ देही के भ्रष्ट हो जाने पर—इस देह से मुक्त हो जाने पर भला इस शरीर में क्या रह जाता है? [अर्थात् कुछ भी नहीं रहता] यही वह [ब्रह्म] है ॥ ४ ॥
इस शरीरस्थ देही—देहवान् आत्मा के विस्रंसमान—अवस्रंसमान अर्थात् भ्रष्ट हो जाने पर इस प्राणादि समुदाय में से भला क्या रह जाता है? अर्थात् कुछ भी नहीं रहता । ‘देहाद्विमुच्यमानस्य’ ऐसा कहकर विस्रंसन शब्द का अर्थ बतलाया गया है । नगर के स्वामी के चले जाने पर जैसे पुरवासियों की दुर्दशा होती है उसी प्रकार इस शरीर में, जिस आत्मा के चले जाने पर, एक क्षण में ही यह भूत और इन्द्रियों का समुदायरूप सब-का-सब बलहीन—विध्वस्त अर्थात् नष्ट हो जाता है वह इससे भिन्न ही सिद्ध होता है ॥ ४ ॥
तात्पर्य पढ़ें
अस्य शरीरस्थस्यात्मनो विस्रंसमानस्यावस्रंसमानस्य भ्रंशमानस्य देहिनो देहवतः; विस्रंसनशब्दार्थमाह—देहाद्विमुच्यमानस्येति किमत्र परिशिष्यते प्राणादिकलापे न किञ्चन परिशिष्यतेऽत्र देहे पुरस्वामिविद्रवण इव पुरवासिनां यस्यात्मनोऽपगमे क्षणमात्रात्कार्यकरणकलापरूपं सर्वमिदं हतबलं विध्वस्तं भवति विनष्टं भवति सोऽन्यः सिद्धः ॥ ४ ॥

यदि कोई ऐसा माने कि यह शरीर, प्राण और अपान आदि के चले जाने से ही नष्ट हो जाता है, उनसे भिन्न किसी आत्मा के जाने से नहीं, क्योंकि प्राणादि के कारण ही मनुष्य जीवित रहता है—तो ऐसी बात नहीं है, [क्योंकि—]
तात्पर्य पढ़ें
स्यान्मतं प्राणापानाद्यपगमादेवेदं विध्वस्तं भवति न तु तद्व्यतिरिक्तात्मापगमात्प्राणादिभिरेव हि मर्त्यो जीवतीति नैतदस्ति—