अध्याय 2 वल्ली 2 - मन्त्र 5

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥

na prāṇena nāpānena martyo jīvati kaścana .
itareṇa tu jīvanti yasminnetāvupāśritau .. 5 ..


कोई भी मनुष्य न तो प्राण से जीवित रहता है और न अपान से ही । बल्कि वे तो, जिसमें ये दोनों आश्रित हैं ऐसे किसी अन्य से ही जीवित रहते हैं ॥ ५ ॥

कोई भी मर्त्य—मनुष्य अर्थात् देहधारी न तो प्राण से जीवित रहता है और न अपान अथवा चक्षु आदि इन्द्रियों से ही, क्योंकि परस्पर मिलकर प्रवृत्त होनेवाले तथा किसी दूसरे के शेषभूत ये इन्द्रिय आदि जीवन के हेतु नहीं हो सकते । लोक में किसी स्वतन्त्र और बिना मिले हुए अन्य [चेतन पदार्थ]-की प्रेरणा के बिना गृह आदि संहत पदार्थों की स्थिति नहीं देखी गयी; उसी तरह संघातरूप होने से प्राणादि की स्थिति भी स्वतन्त्र नहीं हो सकती ।

अतः ये सब परस्पर मिलकर प्राणादि संहत पदार्थों से भिन्न किसी अन्य के द्वारा ही जीवित रहते—प्राण धारण करते हैं, जिस संहत पदार्थ भिन्न सत्स्वरूप परमात्मा के रहते हुए ही यह प्राण-अपान-चक्षु आदि से संहत होकर आश्रित हैं; तात्पर्य यह है कि जिस असंहत आत्मा के लिये प्राण-अपान आदि संहत होकर अपने व्यापारों को करते हुए बर्तते हैं वह आत्मा उनसे भिन्न सिद्ध होता है ॥ ५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

न प्राणेन नापानेन चक्षुरादिना वा मर्त्यो मनुष्यो देहवान् कश्चन जीवति न कोऽपि जीवति न ह्येषां परार्थानां संहत्यकारित्वाज्जीवनहेतुत्वमुपपद्यते । स्वार्थेनासंहतेन परेण केनचि- दप्रयुक्तं संहतानामवस्थानं न दृष्टं गृहादीनां लोके; तथा प्राणादीनामपि संहतत्वाद्भवितुमर्हति ।

अत इतरेणैव संहतप्राणादिविलक्षणेन तु सर्वे संहताः सन्तो जीवन्ति प्राणान्धारयन्ति । यस्मिन्संहतविलक्षण आत्मनि सति परस्मिन्नेतौ प्राणापानौ चक्षुरादिभिः संहतावुपाश्रितौ, यस्यासंहतस्यार्थे प्राणापानादिः स्वव्यापारं कुर्वन्वर्तते संहतः सन्स ततोऽन्यः सिद्ध इत्यभिप्रायः ॥ ५ ॥