अध्याय 2 वल्ली 2 - मन्त्र 6

हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥

hanta ta idaṃ pravakṣyāmi guhyaṃ brahma sanātanam .
yathā ca maraṇaṃ prāpya ātmā bhavati gautama .. 6 ..


हे गौतम! अब मैं फिर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्म का वर्णन करूँगा, तथा [ब्रह्म को न जानने से] मरण को प्राप्त होने पर आत्मा जैसा हो जाता है [वह भी बतलाऊँगा] ॥ ६ ॥
अहो! अब मैं तुम्हें फिर भी इस गुह्य—गोपनीय सनातन—चिरन्तन ब्रह्म के विषय में बतलाऊँगा, जिसके ज्ञान से सम्पूर्ण संसार की निवृत्ति हो जाती है तथा जिसका ज्ञान न होने पर मरण को प्राप्त होने के अनन्तर आत्मा जैसा हो जाता है, अर्थात् वह जिस प्रकार [जन्म-मरणरूप] संसार को प्राप्त होता है, हे गौतम! वह सुन ॥ ६ ॥
तात्पर्य पढ़ें
हन्तेदानीं पुनरपि ते तुभ्यम् इदं गुह्यं गोप्यं ब्रह्म सनातनं चिरन्तनं प्रवक्ष्यामि यद्विज्ञानात् सर्वसंसारोपरमो भवति, अविज्ञानाच्च यस्य मरणं प्राप्य यथात्मा भवति यथा संसरति तथा शृणु हे गौतम ॥ ६ ॥