अध्याय 2 वल्ली 2 - मन्त्र 7

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥

yonimanye prapadyante śarīratvāya dehinaḥ .
sthāṇumanye’nusaṃyanti yathākarma yathāśrutam .. 7 ..


अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार कितने ही देहधारी तो शरीर धारण करने के लिये किसी योनि को प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर-भाव को प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥
अन्य—कुछ अविद्यावान् मूढ देहधारी शरीर धारण करने के लिये वीर्यरूप बीज से संयुक्त होकर योनि—योनिद्वार को प्राप्त होते हैं अर्थात् किसी योनि में प्रविष्ट हो जाते हैं । दूसरे कोई अत्यन्त अधम पुरुष मरण को प्राप्त होकर [यथाकर्म और यथाश्रुत] स्थाणु यानी वृक्षादि स्थावर-भाव का अनुवर्तन—अनुगमन करते हैं । तात्पर्य यह कि यथाकर्म यानी जिसका जो कर्म है अथवा इस जन्म में जिसने जैसा कर्म किया है उसके अधीन होकर तथा यथाश्रुत यानी जिसने जैसा विज्ञान उपार्जित किया है उसके अनुरूप शरीर को ही प्राप्त होते हैं । “जन्म अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार हुआ करते हैं” ऐसी एक दूसरी श्रुति से भी यही प्रमाणित होता है ॥ ७ ॥
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योनिं योनिद्वारं शुक्रबीजसमन्विताः सन्तोऽन्ये केचिद् अविद्यावन्तो मूढाः प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय शरीरग्रहणार्थं देहिनो देहवन्तः; योनिं प्रविशन्तीत्यर्थः । स्थाणुं वृक्षादिस्थावरभावम् अन्येऽत्यन्ताधमा मरणं प्राप्यानुसंयन्त्यनुगच्छन्ति । यथाकर्म यद्यस्य कर्म तद्यथाकर्म यैर्यादृशं कर्मेह जन्मनि कृतं तद्वशेनेत्येतत् । तथा च यथाश्रुतं यादृशं च विज्ञानमुपार्जितं तदनुरूपमेव शरीरं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः । “यथाप्रज्ञं हि संभवाः” इति श्रुत्यन्तरात् ॥ ७ ॥

पहले जो यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं तुझे गुह्य ब्रह्म बतलाऊँगा’ उसे ही बतलाते हैं—
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यत्प्रतिज्ञातं गुह्यं ब्रह्म वक्ष्यामीति तदाह—