अध्याय 2 वल्ली 2 - मन्त्र 8

य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।
एतद्वै तत् ॥ ८ ॥

ya eṣa supteṣu jāgarti kāmaṃ kāmaṃ puruṣo nirmimāṇaḥ .
tadeva śukraṃ tadbrahma tadevāmṛtamucyate .
tasmi~llokāḥ śritāḥ sarve tadu nātyeti kaścana .
etadvai tat .. 8 ..


प्राणादि के सो जाने पर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थों की रचना करता हुआ जागता रहता है वही शुक्र (शुद्ध) है, वह ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है । उसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं; कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । निश्चय यही वह [ब्रह्म] है ॥ ८ ॥

जो यह प्राणादि के सो जाने पर जागता रहता है—[उनके साथ] सोता नहीं है । किस प्रकार जागता रहता है? [इसपर कहते हैं—] अविद्या के योग से स्त्री आदि अपने-अपने इच्छित—अभीष्ट पदार्थों की रचना करता हुआ अर्थात् उन्हें निष्पन्न करता हुआ जागता है वही शुक्र—शुभ्र यानी शुद्ध है । वह ब्रह्म है, उससे भिन्न और कोई गुह्य ब्रह्म नहीं है । वही सब शास्त्रों में अमृत—अविनाशी कहा गया है ।

यही नहीं, उस ब्रह्म में ही पृथिवी आदि सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं, क्योंकि वह सभी लोकों का कारण है । उसका कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता [निश्चय यही वह ब्रह्म है] इत्यादि [आगे की व्याख्या] पूर्ववत् समझनी चाहिये ॥ ८ ॥

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य एष सुप्तेषु प्राणादिषु जागर्ति न स्वपिति । कथम्? कामं कामं तं तमभिप्रेतं स्त्र्याद्यर्थमविद्यया निर्मिमाणो निष्पादयञ्जागर्ति पुरुषो यस्तदेव शुक्रं शुभ्रं शुद्धं तद्ब्रह्म नान्यद् गुह्यं ब्रह्मास्ति । तदेवामृतमविनाशि उच्यते सर्वशास्त्रेषु । किं च पृथिव्यादयो लोकास्तस्मिन्नेव सर्वे ब्रह्मण्याश्रिताः सर्वलोककारणत्वात्तस्य । तदु नात्येति कश्चन इत्यादि पूर्ववदेव ॥ ८ ॥

अनेक तार्किकों की कुबुद्धिद्वारा जिनका चित्त चञ्चल कर दिया गया है, अतः जिनकी बुद्धि सरल नहीं है उन ब्राह्मणों के चित्त में, प्रमाण से युक्त सिद्ध होने पर भी, आत्मैकत्व-विज्ञान बारम्बार कहे जाने पर भी स्थिर नहीं होता । अतः उसके प्रतिपादन में आदर रखनेवाली श्रुति पुनः-पुनः कहती है—
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अनेकतार्किककुबुद्धिविचलितान्तःकरणानां प्रमाणोपपन्नम् अप्यात्मैकत्वविज्ञानमसकृदुच्यमानमप्यनृजुबुद्धिनां ब्राह्मणानां चेतसि नाधीयत इति तत्प्रतिपादन आदरवती पुनः पुनराह श्रुतिः—