अध्याय 2 वल्ली 3 - मन्त्र 1

ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।
एतद्वै तत् ॥ १ ॥

ūrdhvamūlo’vākśākha eṣo’śvatthaḥ sanātanaḥ .
tadeva śukraṃ tadbrahma tadevāmṛtamucyate .
tasmi~llokāḥ śritāḥ sarve tadu nātyeti kaścana .
etadvai tat .. 1 ..


जिसका मूल ऊपर की ओर तथा शाखाएँ नीचे की ओर हैं ऐसा यह अश्वत्थ वृक्ष सनातन (अनादिकालीन) है । वही विशुद्ध ज्योतिः-स्वरूप है, वही ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है । सम्पूर्ण लोक उसी में आश्रित हैं; कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता । यही निश्चय वह [ब्रह्म] है ॥ १ ॥

ऊर्ध्व (ऊपर की ओर) अर्थात् जो वह भगवान् विष्णु का परम पद है वही जिसका मूल है ऐसा यह अव्यक्त से स्थावरपर्यन्त संसारवृक्ष ‘ऊर्ध्वमूल’ है ।

इसका व्रश्चन—छेदन होने के कारण यह वृक्ष कहलाता है । जो जन्म, जरा, मरण और शोक आदि अनेक अनर्थों से भरा हुआ, क्षण-क्षण में अन्यथा भाव को प्राप्त होनेवाला, माया मृगतृष्णा के जल और गन्धर्वनगरादि के समान दृष्टनष्टस्वरूप होने से अन्त में वृक्ष के समान अभावरूप हो जानेवाला, केले के खम्भे के समान निःसार और सैकड़ों पाखण्डियों की बुद्धि के विकल्पों का आश्रय है । तत्त्वजिज्ञासुओं द्वारा जिसका तत्त्व ‘इदम्’ रूप से निर्धारित नहीं किया गया, वेदान्तनिर्णीत परब्रह्म ही जिसका मूल और सार है, जो अविद्या काम, कर्म और अव्यक्तरूप बीज से उत्पन्न होनेवाला है, ज्ञान और क्रिया—ये दोनों शक्तियाँ जिसकी स्वरूपभूत हैं वह अपरब्रह्मरूप हिरण्यगर्भ ही जिसका अंकुर है, सम्पूर्ण प्राणियों के लिङ्गशरीर ही जिसके स्कन्ध हैं, जो तृष्णारूप जल के सिंचन से बढ़े हुए तेजवाला, बुद्धि, इन्द्रिय और विषयरूप नूतन पल्लवों के अंकुरोंवाला, श्रुति, स्मृति, न्याय और ज्ञानोपदेशरूप पत्तोंवाला, यज्ञ, दान, तप आदि अनेक क्रियाकलापरूप सुन्दर फूलोंवाला, सुख, दुःख और वेदनारूप अनेक प्रकार के रसों से युक्त, प्राणियों की आजीविकारूप अनन्त फलोंवाला तथा फलों की तृष्णारूप जल के सिंचन से बढ़े हुए और [सात्त्विक

आदि भावों से] मिश्रित एवं दृढ़तापूर्वक स्थिर हुए [कर्म-वासनादिरूप अवान्तर] मूलोंवाला है; ब्रह्मा आदि पक्षियों ने जिसपर सत्यादि नामोंवाले सात लोकोंरूप घोंसले बना रखे हैं, जो प्राणियों के सुखदुःखजनित हर्ष-शोक से उत्पन्न हुए नृत्य, गान, वाद्य, क्रीडा, आस्फोटन, (खम ठोंकना) हँसी, आक्रन्दन, रोदन तथा हाय-हाय, छोड़-छोड़ इत्यादि अनेक प्रकार के शब्दों की तुमुलध्वनि से अत्यन्त गुञ्जायमान हो रहा है तथा वेदान्तविहित ब्रह्मात्मैक्य-दर्शनरूप असङ्गशस्त्र से जिसका उच्छेद होता है ऐसा यह संसाररूप वृक्ष अश्वत्थ है, अर्थात् अश्वत्थ वृक्ष के समान कामना और कर्मरूप वायु से प्रेरित हुआ नित्य चञ्चल स्वभाववाला है । स्वर्ग, नरक, तिर्यक् और प्रेतादि शाखाओं के कारण यह नीचे की ओर फैली शाखाओंवाला है तथा सनातन यानी अनादि होने के कारण चिरकाल से चला आ रहा है ।

इस संसार का जो मूल है वही शुक्र-शुभ्र-शुद्ध-ज्योतिर्मय अर्थात् चैतन्यात्मज्योतिःस्वरूप है । वही सबसे महान् होने के कारण ब्रह्म है । वही सत्यस्वरूप होने के कारण अमृत अर्थात् अविनाशी स्वभाववाला कहा जाता है । विकार वाणी का विलास और केवल नाममात्र है; अतः उस ब्रह्म से अन्य सब मिथ्या और नाशवान् है । उस परमार्थ सत्य ब्रह्म में उत्पत्ति, स्थिति और लय के समय सम्पूर्ण लोक गन्धर्वनगर, मरीचिकाजल और माया के समान आश्रित हैं ये परमार्थदर्शन हो जाने पर बाधित हो जानेवाले हैं । जिस प्रकार घट आदि कोई भी कार्य मृत्तिका आदि का अतिक्रमण नहीं कर सकते उस प्रकार कोई भी विकार उस ब्रह्म का अतिक्रमण नहीं कर सकता । निश्चय यही वह [ब्रह्म] है ॥ १ ॥

> [ * ]: ‘तूल’ कपास को कहते हैं । वह कपास के पौधे का कार्य है । अतः यहाँ ‘तूल’ शब्द से सम्पूर्ण कार्यवर्ग उपलक्षित होता है ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ऊर्ध्वमूल ऊर्ध्वं मूलं यत् तद्विष्णोः परमं पदमस्येति सोऽयमव्यक्तादिस्थावरान्तः संसारवृक्ष ऊर्ध्वमूलः । वृक्षश्च व्रश्चनात् ।

जन्मजरामरणशोकाद्यनेकानर्थात्मकः प्रतिक्षणमन्यथास्वभावो मायामरीच्युदकगन्धर्वनगरादिवद्दृष्टनष्टस्वरूपत्वादवसाने च वृक्षवदभावात्मकः कदलीस्तम्भवन्निःसारोऽनेकशतपाखण्डबुद्धिविकल्पास्पदस्तत्त्वविजिज्ञासुभिरनिर्धारितेदंतत्त्वो वेदान्तनिर्धारितपरब्रह्ममूलसारोऽविद्याकामकर्म्माव्यक्तबीजप्रभवोऽपरब्रह्मविज्ञानक्रियाशक्तिद्वयात्मकहिरण्यगर्भाङ्कुरः सर्वप्राणिलिङ्गभेदस्कन्धस्तृष्णाजलावसेकोद्भूतदर्पो बुद्धीन्द्रियविषयप्रवालाङ्कुरः श्रुतिस्मृतिन्यायविद्योपदेशपलाशो यज्ञदानतपआद्यनेकक्रियासुपुष्पः सुखदुःखवेदनानेकरसः प्राण्युपजीव्यानन्तफलस्तत्तृष्णासलिलावसेकप्ररूढजडी कृतदृढबद्धमूलः सत्यनामादिसप्तलोकब्रह्मादि भूतपक्षिकृतनीडः प्राणिसुखदुःखोद्भूतहर्षशोकजातनृत्यगीतवादित्रक्ष्वेलितास्फोटितहसिताक्रुष्टरुदितहाहामुञ्चमुञ्चेत्याद्यनेकशब्दकृततुमुलीभूतमहारवो वेदान्तविहितब्रह्मात्मदर्शनासङ्गशस्त्रकृतोच्छेद एष संसारवृक्षोऽश्वत्थोऽश्वत्थवत्कामकर्मवातेरितनित्यप्रचलितस्वभावः, स्वर्गनरकतिर्यक्प्रेतादिभिः शाखाभिरवाक्शाखः; सनातनोऽनादित्वाच्चिरं प्रवृत्तः ।

यदस्य संसारवृक्षस्य मूलं तदेव शुक्रं शुभ्रं शुद्धं ज्योतिष्मच्चैतन्यात्मज्योतिःस्वभावं तदेव ब्रह्म सर्वमहत्त्वात् । तदेवामृतम् अविनाशस्वभावमुच्यते कथ्यते सत्यत्वात् । वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतम् अन्यदतो मर्त्यम् ।

तस्मिन्परमार्थसत्ये ब्रह्मणि लोका गन्धर्वनगरमरीच्युदकमायासमाः परमार्थदर्शनाभावावगमनाः श्रिता आश्रिताः सर्वे समस्ता उत्पत्तिस्थितिलयेषु । तदु तद्ब्रह्म नात्येति नातिवर्तते मृदादिमिव घटादिकार्यं कश्चन कश्चिदपि विकारः । एतद्वै तत् ॥ १ ॥


शङ्का—‘जिसके ज्ञान से अमर हो जाते हैं’ ऐसा जिसके विषय में कहा जाता है वह जगत् का मूलभूत ब्रह्म तो वस्तुतः है ही नहीं; यह सब तो असत् से ही प्रादुर्भूत हुआ है ।

समाधान—ऐसी बात नहीं है [क्योंकि—]

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यद्विज्ञानादमृता भवन्तीत्युच्यते जगतो मूलं तदेव नास्ति ब्रह्मासत् एवेदं निःसृतमिति ।

तन्न—