यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥
yadā pañcāvatiṣṭhante jñānāni manasā saha .
buddhiśca na viceṣṭati tāmāhuḥ paramāṃ gatim .. 10 ..
जिस समय पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के सहित [आत्मा में] स्थित हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती उस अवस्था को परम गति कहते हैं ॥ १० ॥
जिस समय अपने-अपने विषयों से निवृत्त हुई पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ—ज्ञानार्थक होने के कारण श्रोत्रादि इन्द्रियाँ ‘ज्ञान’ कही जाती हैं—मन के साथ अर्थात् वे जिसका अनुवर्तन करनेवाली हैं उस सङ्कल्पादि व्यापार से निवृत्त हुए अन्तःकरण के सहित [आत्मा में] स्थिर हो जाती हैं और निश्चयात्मिका बुद्धि भी अपने व्यापारों में चेष्टाशील नहीं होती—चेष्टा नहीं करती—व्यापार नहीं करती उस अवस्था को ही परम गति कहते हैं ॥ १० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यदा यस्मिन्काले स्वविषयेभ्यो निवर्तितान्यात्मन्येव पञ्च ज्ञानानि—
ज्ञानार्थत्वाच्छ्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि ज्ञानान्युच्यन्ते— अवतिष्ठन्ते सह मनसा यदनुगतानि तेन संकल्पादिव्यावृत्तेनान्तःकरणेन; बुद्धिश्चाध्यवसायलक्षणा न विचेष्टति स्वव्यापारेषु न विचेष्टते न व्याप्रियते तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥