अध्याय 2 वल्ली 3 - मन्त्र 11

तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥

tāṃ yogamiti manyante sthirāmindriyadhāraṇām .
apramattastadā bhavati yogo hi prabhavāpyayau .. 11 ..


उस स्थिर इन्द्रियधारणा को ही योग कहते हैं । उस समय पुरुष प्रमादरहित हो जाता है, क्योंकि योग ही उत्पत्ति और नाशरूप है ॥ ११ ॥

उस ऐसी अवस्था को ही—जो वास्तव में वियोग ही है—योग मानते हैं, क्योंकि योगी की यह अवस्था सब प्रकार के अनर्थसंयोग की वियोगरूपा है । इस अवस्था में ही आत्मा अपने अविद्यादि आरोप से रहित स्वरूप में स्थित रहता है । [उस अवस्था को ही] स्थिर इन्द्रियधारणा कहते हैं—स्थिर अर्थात् अचल इन्द्रियधारणा यानी बाह्य और आन्तरिक करणों को धारण करना ।

तब—उस समय साधक पुरुष अप्रमत्त—प्रमादरहित हो जाता है, अर्थात् चित्तसमाधान के प्रति सर्वदा सयत्न रहता है; जिस समय कि वह योग में प्रवृत्त होता है [उस समय ऐसी स्थिति होती है]—ऐसा इस वाक्य की सामर्थ्य से जाना जाता है, क्योंकि बुद्धि आदि की चेष्टा का अभाव हो जाने पर प्रमाद होना सम्भव नहीं है । अतः बुद्धि आदि की चेष्टा का अभाव होने से पूर्व ही अप्रमाद का विधान किया जाता है । अथवा जिस समय भी इन्द्रियों की धारणा स्थिर होती है उसी समय निरङ्कुश अप्रमत्तत्व होता है; इसीलिये ‘उस समय अप्रमत्त हो जाता है’ ऐसा कहा है । ऐसी बात क्यों है? क्योंकि योग ही प्रभव और अप्यय यानी उत्पत्ति और लयरूप धर्मवाला है; अतः तात्पर्य यह है कि अपाय (लय) की निवृत्ति के लिये प्रमाद का अभाव करना चाहिये ॥ ११ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

तामीदृशीं तदवस्थां योगम् इति मन्यन्ते वियोगमेव सन्तम् । सर्वानर्थसंयोगवियोगलक्षणा हीयमवस्था योगिनः । एतस्यां ह्यवस्थायामविद्याध्यारोपणवर्जितस्वरूपप्रतिष्ठ आत्मा । स्थिराम् इन्द्रियधारणां स्थिरामचलाम् इन्द्रियधारणां बाह्यान्तःकरणानां धारणमित्यर्थः ।

अप्रमत्तः प्रमादवर्जितः समाधानं प्रति नित्यं यत्नवांस्तदा तस्मिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो भवतीति सामर्थ्यादवगम्यते । न हि बुद्ध्यादिचेष्टाभावे प्रमादसंभवोऽस्ति । तस्मात्प्रागेव बुद्ध्यादिचेष्टोपरमादप्रमादो विधीयते । अथवा यदैवेन्द्रियाणां स्थिरा धारणा तदानीमेव निरङ्कुशमप्रमत्तत्वमित्यतः, अभिधीयतेऽप्रमत्तस्तदा भवतीति । कुतः? योगो हि यस्मात् प्रभवाप्ययौ उपजनापायधर्मक इत्यर्थोऽतोऽपायपरिहारायाप्रमादः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ११ ॥


यदि ब्रह्म बुद्धि आदि की चेष्टा का विषय होता तो ‘यह वह [ब्रह्म] है’ इस प्रकार विशेषरूप से ग्रहण किया जा सकता था; किन्तु बुद्धि आदि के निवृत्त हो जाने पर तो उसे ग्रहण करने के कारण का अभाव हो जाने से उपलब्ध न होनेवाला वह ब्रह्म वस्तुतः है ही नहीं ।

लोक में जो वस्तु इन्द्रियगोचर होती है वही ‘है’ इस प्रकार प्रसिद्ध होती है और इसके विपरीत [इन्द्रियगोचर न होनेवाली] वस्तु ‘असत्’ कही जाती है, अतः योग व्यर्थ है । अथवा उपलब्ध होनेवाला न होने से ब्रह्म ‘नहीं है’ इस प्रकार जानना चाहिये—ऐसा प्राप्त होने पर यह कहा जाता है—ठीक है,

संस्कृत भाष्य पढ़ें

बुद्ध्यादिचेष्टाविषयं चेद् ब्रह्मेदं तदिति विशेषतो गृह्येत बुद्ध्याद्युपरमे च ग्रहणकारणाभावाद् अनुपलभ्यमानं नास्त्येव ब्रह्म ।

यद्धि करणगोचरं तदस्तीति प्रसिद्धं लोके विपरीतं चासद् इत्यतश्चानर्थको योगः । अनुपलभ्यमानत्वाद्वा नास्तीत्युपलब्धव्यं ब्रह्मेत्येवं प्राप्त इदमुच्यते—सत्यम्,