अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥
tāṃ yogamiti manyante sthirāmindriyadhāraṇām .
apramattastadā bhavati yogo hi prabhavāpyayau .. 11 ..
उस ऐसी अवस्था को ही—जो वास्तव में वियोग ही है—योग मानते हैं, क्योंकि योगी की यह अवस्था सब प्रकार के अनर्थसंयोग की वियोगरूपा है । इस अवस्था में ही आत्मा अपने अविद्यादि आरोप से रहित स्वरूप में स्थित रहता है । [उस अवस्था को ही] स्थिर इन्द्रियधारणा कहते हैं—स्थिर अर्थात् अचल इन्द्रियधारणा यानी बाह्य और आन्तरिक करणों को धारण करना ।
तब—उस समय साधक पुरुष अप्रमत्त—प्रमादरहित हो जाता है, अर्थात् चित्तसमाधान के प्रति सर्वदा सयत्न रहता है; जिस समय कि वह योग में प्रवृत्त होता है [उस समय ऐसी स्थिति होती है]—ऐसा इस वाक्य की सामर्थ्य से जाना जाता है, क्योंकि बुद्धि आदि की चेष्टा का अभाव हो जाने पर प्रमाद होना सम्भव नहीं है । अतः बुद्धि आदि की चेष्टा का अभाव होने से पूर्व ही अप्रमाद का विधान किया जाता है । अथवा जिस समय भी इन्द्रियों की धारणा स्थिर होती है उसी समय निरङ्कुश अप्रमत्तत्व होता है; इसीलिये ‘उस समय अप्रमत्त हो जाता है’ ऐसा कहा है । ऐसी बात क्यों है? क्योंकि योग ही प्रभव और अप्यय यानी उत्पत्ति और लयरूप धर्मवाला है; अतः तात्पर्य यह है कि अपाय (लय) की निवृत्ति के लिये प्रमाद का अभाव करना चाहिये ॥ ११ ॥
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तामीदृशीं तदवस्थां योगम् इति मन्यन्ते वियोगमेव सन्तम् । सर्वानर्थसंयोगवियोगलक्षणा हीयमवस्था योगिनः । एतस्यां ह्यवस्थायामविद्याध्यारोपणवर्जितस्वरूपप्रतिष्ठ आत्मा । स्थिराम् इन्द्रियधारणां स्थिरामचलाम् इन्द्रियधारणां बाह्यान्तःकरणानां धारणमित्यर्थः ।
अप्रमत्तः प्रमादवर्जितः समाधानं प्रति नित्यं यत्नवांस्तदा तस्मिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो भवतीति सामर्थ्यादवगम्यते । न हि बुद्ध्यादिचेष्टाभावे प्रमादसंभवोऽस्ति । तस्मात्प्रागेव बुद्ध्यादिचेष्टोपरमादप्रमादो विधीयते । अथवा यदैवेन्द्रियाणां स्थिरा धारणा तदानीमेव निरङ्कुशमप्रमत्तत्वमित्यतः, अभिधीयतेऽप्रमत्तस्तदा भवतीति । कुतः? योगो हि यस्मात् प्रभवाप्ययौ उपजनापायधर्मक इत्यर्थोऽतोऽपायपरिहारायाप्रमादः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ११ ॥
यदि ब्रह्म बुद्धि आदि की चेष्टा का विषय होता तो ‘यह वह [ब्रह्म] है’ इस प्रकार विशेषरूप से ग्रहण किया जा सकता था; किन्तु बुद्धि आदि के निवृत्त हो जाने पर तो उसे ग्रहण करने के कारण का अभाव हो जाने से उपलब्ध न होनेवाला वह ब्रह्म वस्तुतः है ही नहीं ।
लोक में जो वस्तु इन्द्रियगोचर होती है वही ‘है’ इस प्रकार प्रसिद्ध होती है और इसके विपरीत [इन्द्रियगोचर न होनेवाली] वस्तु ‘असत्’ कही जाती है, अतः योग व्यर्थ है । अथवा उपलब्ध होनेवाला न होने से ब्रह्म ‘नहीं है’ इस प्रकार जानना चाहिये—ऐसा प्राप्त होने पर यह कहा जाता है—ठीक है,
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बुद्ध्यादिचेष्टाविषयं चेद् ब्रह्मेदं तदिति विशेषतो गृह्येत बुद्ध्याद्युपरमे च ग्रहणकारणाभावाद् अनुपलभ्यमानं नास्त्येव ब्रह्म ।
यद्धि करणगोचरं तदस्तीति प्रसिद्धं लोके विपरीतं चासद् इत्यतश्चानर्थको योगः । अनुपलभ्यमानत्वाद्वा नास्तीत्युपलब्धव्यं ब्रह्मेत्येवं प्राप्त इदमुच्यते—सत्यम्,